उत्तराखडं हरिद्वार स्थित चुड़ियाला में तैयार होने वाले आकर्षक एवं खास किस्म के दीपकों की पंजाब, हरियाणा, दिल्ली एवं कश्मीर से लेकर विभिन्न राज्यों में भारी डिमांड है।
कई राज्यों में यहां के बने दीये लोग अपने घरों में सजाकर जलाते हैं। इस काम में लगे सैकड़ों हाथ वर्षों से अपनी प्रतिभा को बखूबी अंजाम दे रहे हैं।
दीपक बनाने में महारथ हासिल
चुड़ियाला सहित क्षेत्र के माहेश्वरी, कुंजाबहादरपुर व भलस्वागाज गांव के सैकड़ों लोगों को खास तरीके के दीपक बनाने में महारथ हासिल है। हाथों की जादूगरी से बने इन दीपकों की डिमांड देश के कई राज्यों में है। दीवाली से पूर्व क्षेत्र से दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, एवं जम्मू कश्मीर सहित विभिन्न राज्यों में लाखों की संख्या में दीपकों की सप्लाई होती है। दीपक बनाने का काम दीपावली के छह माह पूर्व से शुरु हो जाता है।
बड़े कारोबारी कमाते हैं मोटा मुनाफा
दीपक के काम से जुड़े बड़े व्यापारी मोटा मुनाफा कमाते हैं। जबकि इन दीपक को बनाने वाले कारोबारी की स्थिति जस की तस है। बड़े व्यापारी मिट्टी के दीपक बनाने का आर्डर दीपावली के छह माह पहले से देना शुरु कर देते हैं। कारीगर थोक व्यापारियों को पंद्रह रुपये सैकड़ा दीपक बेचते हैं। थोक कारोबारी इन दीपक को पच्चीस से तीस रुपये में फुटकर दुकानदारों को बेंचते हैं। वहीं फुटकर कारोबारी तकरीबन चालीस रुपये सैकड़ा दीपक बेंचते हैं।
झेल रहे गरीबी का दंश
दीपक बनाने के काम में जुटे सैकड़ों कारीगर गरीबी का दंश झेल रहे है। चमनलाल, माधोराम, रफल सिंह सोनू व फूल सिंह समेत अन्य कारीगरों का कहना है कि छह माह की कमाई से पूरे साल का घर खर्च चलाना होता है। इसलिए दीपक बनाने के काम में उनके बच्चे भी हाथ बंटाते हैं। एक कारीगर एक दिन में पांच हजार दीपक बना लेता है।
सस्ते दामों में मिल रहे दीप
जिससे उसे तकरीबन 750 रुपये प्रतिदिन की कमाई होती है। दीपक बनाने का काम दीपावली से छह माह पूर्व से शुरु हो जाता है। कारीगरों के मुताबिक दुनिया की हर चीज मंहगी हो गई। लेकिन उनके बनाए दीपक आज भी सस्ते दामों में खरीदे जा रहे हैं। कारीगरों के मुताबिक अच्छे दाम न मिलने के कारण वह आज भी गरीबी की मार झेल रहे हैं।