उत्तराखंड की चार धाम यात्रा का देश दुनिया में नाम है। वर्ष 2018 में 28 लाख से ज्यादा यात्री चार धाम की यात्रा पर आए हैं। मगर यात्रा के संचालन की व्यवस्था बिखरी-बिखरी सी दिखती है। बदरीनाथ और केदारनाथ मंदिर की यात्रा व्यवस्था मंदिर समिति देखती है, जबकि उसका गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा पर कोई नियंत्रण नहीं है। गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा व्यवस्था वहां की अलग-अलग कमेटियां देखती हैं। इस वजह से यात्रा व्यवस्था में हमेशा तालमेल का अभाव दिखता है।
कहने भर की है चार धाम यात्रा विकास परिषद
एनडी तिवारी सरकार ने चार धाम यात्रा व्यवस्था को एक छतरी के नीचे लाने की जरूरत सबसे पहले 2004 में महसूस की थी। परिषद का गठन तो हो गया, लेकिन एक्ट न होने के कारण तब से लेकर अब तक यह परिषद सिर्फ कहने भर की रह गई है। न इसके पास अपना कार्यालय है और न ही अन्य आधारभूत ढांचा। इस वजह से यात्रा व्यवस्था में इस परिषद की प्रभावी भूमिका कभी बन ही नहीं पाई।
उत्तराखंड में श्राइन बोर्ड के गठन की बात करते हुए हमेशा वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड जेहन में रहा है। हालांकि उत्तराखंड के चार धामों के बीच भौगोलिक दूरी काफी है, इसके बावजूद माना जा रहा है कि यह निर्णय चार धाम यात्रा की सूरत बदल सकता है।
वैष्णो देवी मंदिर श्राइन बोर्ड का गठन 1986 में बने एक्ट के अधीन किया गया है। इससे पहले एक धर्मार्थ ट्रस्ट यात्रा व्यवस्था को देख रहा था और सुविधाओं के अभाव को साफ महसूस किया जा रहा था। मंदिर के चढ़ावे का बेहतर इस्तेमाल यात्री सुविधाओं के लिए जिस तरह से वहां किया गया है, वैसा उत्तराखंड में नहीं हो पाया है।
चार धाम यात्रा व्यवस्था के और बेहतर संचालन के लिए सरकार गंभीर है। यात्रा व्यवस्था एक छतरी के नीचे आए, इसके लिए गंभीर कोशिश हो रही है। इस कोशिश में हम विधायकों, जनप्रतिनिधियों को भी सहभागी बनाएंगे।
- सतपाल महाराज, संस्कृति मंत्री, उत्तराखंड।