एनएच-74 घोटाले में सीबीआई जांच की सिफारिश पर सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के आपत्ति जताने के बाद अब नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) के चेयरमैन ने उत्तराखंड शासन को पत्र लिखकर इस घोटाले में ऊधमसिंह नगर में दर्ज एफआईआर से एनएच अफसरों के नाम हटाने को कहा है।
विभिन्न तर्कों के हवाले से उन्होंने कहा है कि इस पूरे मामले में गलत मुआवजा बांटने में लोकल मशीनरी दोषी है, एनएच अफसरों का इससे क्या लेना-देना ? मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और केंद्रीय मंत्री गडकरी की मुलाकात के अगले ही दिन आए इससे संबंधित पत्र से शासन में खलबली मची हुई है।
यह मामला इस लिहाज से बेहद अहम है कि मुख्यमंत्री बनने के ठीक बाद प्रेस कांफ्रेंस करके त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तीन सौ करोड़ से ज्यादा के एनएच घोटाले की सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश करने का एलान किया था। केंद्र की चुप्पी देखकर उत्तराखंड सरकार की ओर से रिमाइंडर भेजा गया, मगर नतीजा कुछ नहीं निकला।
उल्टे इसके कुछ ही दिन बाद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को पत्र लिखकर मामले की सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था कि इस प्रकार की कार्रवाई से अफसरों का मनोबल टूटता है। यदि इस संबंध में संशोधित फैसला नहीं लिया जाता है, तो उत्तराखंड में मौजूदा और भविष्य के प्रोजेक्ट पर दोबारा विचार करना पड़ेगा। इसके बाद मुख्यमंत्री ने बीती 25 मई को गडकरी से मुलाकात की।
मुलाकात में उन्होंने राज्य का स्टैंड क्लियर होने की बात भी कही। इधर, कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत ने बयान दिया कि सीबीआई की ओर से मामले को टेकअप करने में हो रही देरी के चलते फिलहाल राज्य की एजेंसियां जांच करती रहेंगी। कुल मिलाकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की प्रतिष्ठा से जुड़े इस मामले में राज्य सरकार की फजीहत होती नजर आ रही है।
इसी क्रम में अब ताजा घटनाक्रम एनएचएआई के चेयरमैन युद्धवीर सिंह मलिक के पत्र से जुड़ा है। सीएम की गडकरी से मुलाकात के ठीक अगले दिन यानी 26 मई को उत्तराखंड शासन को जारी इस पत्र में उन्होंने ऊधमसिंह नगर जिला प्रशासन की ओर से दर्ज कराई गई उस एफआईआर में से एनएच अफसरों के नाम हटाने को कहा है।
चेयरमैन का कहना है कि अधिग्रहण करने से लेकर मुआवजा वितरण का सारा काम राज्य की एजेंसियों का है, ऐसे में एनएच अफसरों का इससे कोई लेनादेना नहीं है। पिक एंड चूज का आरोप एनएचएआई अधिकारियों पर पूरी तरह से गलत है, अत: उनके नाम एफआईआर से हटाए जाने चाहिए।
शासन में बैठे अधिकारियों की मानें तो इस पूरे घटनाक्रम से एनएचएआई अधिकारियों को मनोबल टूटने से बचाने का प्रयास उत्तराखंड सरकार पर जरूर भारी पड़ेगा। यहां तक कि मुख्यमंत्री तक को भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस बोलने से पहले हजार बार सोचना पड़ेगा। विपक्ष को यह ऐसा हथियार मिलेगा, जो सरकार को बैकफुट पर धकेलने में कारगर होगा। यही नहीं, इस उठापटक से घोटाले में लिप्त अधिकारियों का मनोबल जरूर ऊंचा होगा कि उनके बचने की भूमिका तैयार हो रही है।
एफआईआर में एनएच अफसरों पर आरोप
- रुद्रपुर और नजीबाबाद के एनएचएआई प्रोजेक्ट डायरेक्टर और उनके अधीनस्थ अधिकारी कलेक्टर/आर्बिटेटर के समक्ष अधिकाधिक मुआवजा दिए जाने की दशा में अपील करने में असफल रहना।
- उत्तराखंड में एनएचएआई के क्षेत्रीय अधिकारी के द्वारा मनमाने तरीके (पिक एंड चूज) से काश्तकारों को मुआवजा वितरण करना। इनमें ज्यादातर ऐसे मामले हैं, जिन्हें अकृषि श्रेणी में मुआवजा मिला।