आपदा से बचाने के लिए हिमालयी क्षेत्र में पहाड़ों पर रहना अधिक सुरक्षित है। खेती के लिए नदियों के कटान से बने टीले आबादी के लिए नहीं खेती के लिए अधिक मुफीद हैं।
उत्तराखंड के गढ़वाल और आसपास के हिमालयी क्षेत्र की ताजा भौगोलिक स्थिति की रिपोर्ट मिलने के बाद केंद्र ने प्रदेश सरकार को यह मशविरा दिया है। विकास कार्यों की कार्ययोजना का नया खाका पहाड़ों पर ही बनाया जाए। आपदा के मद्देनजर गढ़वाल और आसपास की ताजा भौगोलिक स्थिति का जायजा लेने के बाद विज्ञानियों ने केंद्र को रिपोर्ट भेजी। इस पर केंद्र ने अपनी मोहर लगाकर प्रदेश सरकार को भेज दिया है।
पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए केंद्र वित्त पोषित और राज्य सरकार की कार्ययोजनाओं पर अमली जामा पहनाया जा रहा है। आपदाएं इस विकास कार्य को चौपट न कर दें, इसके लिए जियोलोजिकल सर्वे आफ इंडिया (जीएसआई) ने भी भूस्खलन वाले क्षेत्रों का मैप तैयार किया है। इसके मुताबिक कार्य कराने पर सुरक्षा रहेगी।
इसके साथ ही वर्ष 2013 की आपदा के बाद वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान ने उत्तराखंड की ताजा भौगोलिक स्थिति पर रिपोर्ट तैयार करके केंद्र सरकार को भेजी। केंद्र सरकार को भेजी रिपोर्ट में बताया गया कि हिमनद के सिकुड़ने से नदियों की बाढ़ के कारण बड़े और चौड़े टीले (टेरेसेस) बन गए।
पहले लोग पहाड़ पर रहते थे और खेती इन टीलों पर करते थे, लेकिन बाद में इन टीलों पर आबादी बसने लगी। इससे जब भी आपदा आती है जान और माल दोनों का नुकसान होता है। रिपोर्ट में पर्वतीय क्षेत्रों में आबादी बसने और विकास कार्यों की पुरानी पद्धति पर जोर दिया गया।
सर्वेक्षण टीम के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. प्रदीप श्रीवास्तव ने बताया कि आज भी पहाड़ों पर रहना और टीलों पर खेती अधिक सुरक्षित है। केंद्र ने रिपोर्ट की प्रति प्रदेश सरकार को भेजी है। जीएसआई के उप महानिदेशक डॉ. वीके शर्मा का कहना है कि भूस्खलन वाले क्षेत्रों का नक्शा विकास कार्यों के लिए मददगार साबित होगा।