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नैनीताल में एक साथ मिली सात अनोखी गुफाएं

Thu, 09 Oct 2014 02:49 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, हल्द्वानी
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प्रकृति चूने के पत्थर और जल से कई चक्रों में भूगर्भीय संरचनाएं बनाती है। कभी-कभी उनमें कौतुक भरे नजारे भी देखने को मिलते हैं।
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उत्तराखंड की कुछ कुदरती कंदराएं इन्हीं कौतुक का हिस्सा बन गई हैं। नैनीताल के ओखलकांडा ब्लाक के डुंगरी गांव में हाल ही में एकसाथ मिली सात गुफाओं में बनी आकर्षक ईश्वरीय आकृतियों ने लोगों में कौतूहल पैदा कर दिया है।

हालांकि इन अदभुत भू संरचनाओं को कुछ लोग अपनी धार्मिक श्रद्धा से जोड़ रहे हैं। वैसे नैनीताल जिले में एक साथ इस तरह की प्राकृतिक गुफाएं मिलने का पहला मामला है।
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डुंगरी की यह सातों गुफाएं ऐतिहासिक राजाकोट किले से सात किलोमीटर दूर रानीकोट में मिली हैं। गुफाओं के भीतर बनी देव आकृतियां विश्व प्रसिद्ध पाताल भुवनेश्वर गुफा से मेल खाती हैं।

हैरत में पड़े गांव के लोग

नंधौर नदी घाटी की पदयात्रा पर गए शैलनट संस्था के सदस्यों ने ग्रामीणों के सहयोग से इन गुफाओं को खोजा है।

शैलनट का अध्ययन दल चार से छह अक्तूबर तक भीमताल के अंतर्गत ओखलकांडा ब्लाक के अधौड़ा और डुंगरी गांव के भ्रमण पर गया था। रानीकोट पहुंचने पर जब सात गुफाओं के द्वार साथ मिले तो संस्था के सदस्य और गांव के लोग हैरत में पड़ गए।

हालांकि यह गुफाएं आपस में जुड़ी हैं या नहीं, इसका पता नहीं चला है। दल के सदस्य गांव के लोगों के साथ पांच गुफाओं के भीतर करीब 100 से 150 फीट नीचे तक उतरे।

बाकी दो गुफाओं में अंधेरा ज्यादा होने और आक्सीजन की कमी के चलते नहीं उतरा जा सका। इन गुफाओं में भगवान गणेश के अलावा कई अन्य देवी, देवताओं की सुंदर आकृतियां उभरी हैं। गांव के लोगों ने इन गुफाओं में पूजा-अर्चना भी की।

पूर्व में राजाकोट और डुंगरी गांव के सर्वे के वक्त हो सकता है ग्रामीणों को इन गुफाओं की जानकारी न हो। इसीलिए एकसाथ मिलीं ऐसी गुफाएं फिलहाल रिकार्ड में नहीं हैं। इन प्राकृतिक गुफाओं में धार्मिक चित्रों का उभरना बड़ी बात है। इसके लिए दुबारा सर्वे कराएंगे।
- डॉ. चंद्र सिंह चौहान, प्रभारी, क्षेत्रीय पुरातत्व इकाई, अल्मोड़ा
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1636 में बना था किला

लोकमान्यता है कि राजा त्रिमलचंद ने अधोड़ा के पास एक पहाड़ी में राजाकोट किला 1636 में बनवाया था। किले में 22 कमरे थे। इसके अवशेष आज भी वहां हैं।

ककोड़ के जिला पंचायत सदस्य कृष्णानंद कांडपाल, जीवन कांडपाल, बद्री दत्त शर्मा और डुंगरी के सरपंच भगवान दत्त कांडपाल बताते हैं कि राजा त्रिमलचंद ने तब थोकदार रावतों के तानाशाही व्यवहार से ग्रामीणों को मुक्ति दिलाई थी।

किले से सात किलोमीटर दूर रानीकोट पड़ता है। पुरातत्व विभाग राजाकोट किले का सर्वे करा चुका है और वहां मिले ताम्रपत्र के आधार पर यह माना जाता है कि चंद राजा त्रिमलचंद ने 1625 से 1638 तक वहां शासन किया था।

ऐसे है पहुंचने का रास्ता
रानीकोट तक पहुंचने के लिए हल्द्वानी से वाया भीमताल, धानाचूली, ओखलकांडा, खनस्यूं, पतलोट होते हुए डुंगरी तक 130 किमी सड़क मार्ग से जाना पड़ता है। उसके बाद चार किमी पैदल दूरी में राजाकोट किला और सात किमी आगे रानीकोट पड़ता है।

यह लोग थे अध्ययन दल में शामिल
डॉ. डीएन भट्ट, डॉ. दिनेश जोशी, सुनील पंत, महेंद्र सिंह राणा, प्रेम राम, भूपाल सिंह, कमल भट्ट, नारायण दत्त, हरीश भट्ट, खीम सिंह बोरा, पूजा, खुशी, प्रियांशु, हिमांशी और चिराग कांडपाल।
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