भगवान का पर्याय माने जाने वाले डॉक्टर कितने संवेदनशील हैं, इसका नजारा दून अस्पताल में देखने को मिला।
डॉक्टरों ने हाथ तक नहीं लगाया
इमरजेंसी रुम में एक महिला तकरीबन डेढ़ घंटे तक इलाज के लिए तड़पती रही, लेकिन डॉक्टरों ने उसे हाथ तक नहीं लगाया।
महिला के बेटे के रूंधे गले की गुहार से इंटर्न तो पसीजीं, लेकिन उनके ऑक्सीजन मास्क लाने तक डेढ़ घंटा गुजर चुका था।
सांस लेने में बेहद परेशानी झेल रही मरीज की सांस थमी नहीं, गनीमत बस यही रही। यह घटना गुरुवार दोपहर तकरीबन साढ़े 12 बजे की है। सांस लेने में परेशानी झेल रही मां को उठाए 18 वर्षीय अमन इमरजेंसी में दाखिल हुआ।
यहां डॉक्टर राहुल जोशी की ड्यूटी थी। उसने कई बार डॉक्टर को बुलाया। लेकिन डॉक्टर ने खुद को व्यस्त बताते हुए उसे डपट दिया। वह साथियों के साथ चाय की चुस्की लेते गपियाते रहे।
मां की हालत देख अमन के आंसू बहने लगे। कभी अपनी मां का सर उठाता तो कभी मां के हाथों को सहलाता। फिर इधर से उधर डॉक्टर के पीछे भागता।
आखिर इंटर्न का दिल पसीजा
महिला की हालत बिगड़ रही थी। लेकिन डॉक्टरों का रवैया देख इंटर्न की हिम्मत मरीज को अटैंड करने की नहीं हुई। आखिर एक इंटर्न का दिल पसीजा वह ऑक्सीजन मास्क लेकर आई। तब तक सवा दो बज चुके थे।
आलम यह था कि इमरजेंसी रुम में वार्ड ब्वाय तक नहीं थे। अमन ने खुद अपनी मां को उठाकर बेड पर लिटाया। फार्म भरने में भी 15 मिनट लगे।
लंबी प्रक्रिया के बाद महिला को भर्ती तो किया गया, लेकिन ड्यूटी पर बैठे डॉक्टर ने महिला की जांच नही की। इंटर्न ने अमन से शुक्रवार को सारी जांच कराने के लिए कहा।
इस संबंध में डॉक्टर का पक्ष लेने की कोशिश की गई, लेकिन उनका मोबाइल स्विच आफ बताता रहा।
हाथ में सुई गोदतीं रहीं इंटर्न
दून अस्पताल में मरीज भगवान भरोसे हैं। हालत यह है कि एक इंटर्न ने महिला को ग्लूकोज चढ़ाने के लिए उसके हाथ में तीन बार सुई लगाई, लेकिन सही नहीं लगा पाई।
एक बार में सुई सही न लगने पर उसे निकालकर दोबारा लगाया। बार-बार सुई निकालने और लगाने से महिला दर्द से चिल्लाती रही।