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दून अस्पताल में बांटी जा रही बीमारियां

Mon, 25 Aug 2014 11:31 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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देहरादून का दून अस्पताल जल्द ही मेडिकल कॉलेज बनने की राह पर है, लेकिन यहां की बदहाली मरीजों की सेहत पर भारी पड़ रही है।
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न विशेषज्ञ डॉक्टर है और न ही स्टाफ
2500 से अधिक प्रतिदिन ओपीडी वाले अस्पताल में इलाज की जगह मरीजों को दूसरी बीमारियां बांटी जा रही हैं। हालत यह है कि अस्पताल में थैलीसीमिया के मरीजों के लिए न तो कोई विशेषज्ञ डॉक्टर है और न ही स्टाफ।

यही नहीं, इसके लिए वार्ड तक नहीं है। जो कामचलाऊ वार्ड बनाया गया है उसकी हालत ऐसी है कि वहां पर खून चढ़ाते समय संक्रमण का खतरा बना रहता है। यही हाल अस्पताल के पंचकर्म विभाग का है।
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जहां पर पंचकर्म थेरेपी की जाती है, वहां पर सीलन भरी बदबू इतनी रहती है कि लोग परेशान हैं। हालत यह है कि अब कोई इलाज के लिए ही नहीं आता। सोचा जा सकता है कि ऐसा अस्पताल यदि मेडिकल कालेज बनेगा तो वहां पर किस तरह का इलाज किया जाएगा?

‘बरामदा वार्ड’ में जिंदगी को मिलता है खून
घोर अव्यवस्थाओं से जूझ रहे दून अस्पताल में एक वार्ड ऐसा भी है, जिसे बरामदा वार्ड कहा जाता है। कमरा नहीं मिलने पर थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों को खून चढ़ाने के लिए बरामदे में ही तीन बेड डालने के बाद यह नाम मिला है।

लेकिन इस ‘वार्ड’ में आने वाले बच्चों के लिए खून चढ़ाने के दौरान यहां बिताए जाने वाले दो-तीन घंटे जिंदगी की जंग से कमतर नहीं होते। हर रोज थैलीसीमिया के सौ रोगियों की आमद वाले इस वार्ड में बच्चों को अपनी बारी के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है।

एक बेड पर दो से तीन बच्चे लिटा दिए जाते हैं। जबकि थैलीसीमिया के उपचार के लिए अस्पताल में कोई विशेषज्ञ डाक्टर और पर्याप्त स्टाफ नहीं है। यही नहीं, जिस बेड पर बच्चों को खून चढ़ाया जाता है, उसकी चादर महीनों तक नहीं बदली जाती है।

वार्ड में भी चारों ओर कचरा फैला रहता है। यह हाल तब है, जबकि खून चढ़ाने के दौरान संक्रमण के खतरों की आशंका के चलते थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों को स्वच्छ माहौल देने की जरूरत डाक्टर भी बताते हैं।

पंचकर्म कक्ष में टपक रहा टायलेट का पानी
दून अस्पताल में मरीजों की सेहत से जमकर खिलवाड़ किया जा रहा है। आयुर्वेद विभाग की ओर से पंचकर्म थेरेपी की व्यवस्था है, लेकिन जिस कक्ष में थेरेपी की जाती है उसके ठीक ऊपर वाले वार्ड से आ रहे टायलेट का पाइप लीक होने से पंचकर्म कक्ष की हालत खराब है।

कमरे में सीलन भरी दुर्गंध रहती है। पहले इस कक्ष में प्रतिदिन पांच से सात मरीजों की थेरेपी होती थी, लेकिन अब रोजाना मुश्किल से दो मरीज आ रहे हैं। अधिकतर मरीज कमरे की स्थिति देखकर लौट जाते हैं।

डॉक्टरों का कहना है कि दुर्गंध से सांस की दिक्कत, एलर्जी और दूसरे रोग हो सकते हैं। यहां काम करने वाले डॉक्टर और अन्य स्टाफ भी परेशान हैं। आयुर्वेद विभाग के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. जेएन नौटियाल ने स्वीकार किया कि कमरे में गंदगी की वजह से मरीज लौट रहे हैं।

दून अस्पताल प्रशासन के पास इसके लिए कोई बजट नहीं है। मेडिकल कालेज के लिए बिल्डिंग का रिनोवेशन का काम निगम को करना है। निर्माण निगम को पंचकर्म कक्ष की स्थिति के बारे में बता दिया गया है।
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- डॉ. आरएस असवाल, प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक (दून अस्पताल)

कोल्ड पैक नहीं होने पर चार घंटे के भीतर खून चढ़ाया जाना चाहिए। ब्लड बैंक से बाहर ज्यादा समय तक रखने पर खून में बैक्टीरिया पैदा हो जाते हैं। जिस रोगी को खून चढ़ रहा है, उसे खतरा हो सकता है।
- डॉ. संजय उप्रेती, निदेशक, आईएमए ब्लड बैंक
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