पंचायत चुनाव पर मनमाफिक फैसले से सरकार तो खुश है, लेकिन चुनावी तैयारियों में लाखों रुपए पानी की तरह बहा चुके संभावित प्रत्याशियों की नींद उड़ गई है।
चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी
इन प्रत्याशियों ने नामांकन पत्र खरीदने के बाद चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी थी। जगह-जगह मतदाताओं को रिझाते होर्डिंग और बैनर लग चुके हैं। वोटों का पूरा हिसाब-किताब लगाया जा चुका है।
लेकिन ऐन मौके पर चुनाव टलने से सब गड़बड़ा गया। प्रत्याशियों की सबसे बड़ी चिंता चुनावी खर्च को लेकर है। चुनाव में जितनी देर होगी मतदाताओं को बांधे रखने में उतना ही खर्च होगा।
पहली बार ऐसी स्थिति
राज्य गठन के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि सरकार लगातार पंचायत चुनाव को टालती आ रही है। पंचायतों का कार्यकाल सितंबर 2013 में समाप्त हो चुका है। कायदे से इससे पहले ही चुनाव हो जाने चाहिए थे।
पंचायतों में प्रशासकों की नियुक्ति भी विवादों में घिरी रही। इस संबंध में तीन अलग-अलग शासनादेश जारी किए गए। जुलाई 2013 के शासनादेश में कहा गया था कि प्रशासक की नियुक्ति के लिए अगल से आदेश जारी होगा।
वहीं, एक अक्तूबर 2013 को सरकार ने शासनादेश जारी कर कहा कि पंचायतों में निवर्तमान जनप्रतिनिधियों को प्रशासक बनाया जा सकता है। लेकिन तीन अक्तूबर को जारी जीओ में वीडीओ को पंचायतों में प्रशासक नियुक्ति करने का आदेश दिया गया।
अनुमति से अधिक खर्च
पंचायत चुनाव में ग्राम प्रधान और क्षेत्र पंचायत सदस्य प्रत्याशी के लिए 25 हजार, जिला पंचायत सदस्य 70 हजार और ग्राम पंचायत सदस्य पद के प्रत्याशी के लिए चुनावी खर्च की सीमा पांच हजार रुपए तय है।
हालांकि, यह नियम सिर्फ कहने के लिए है। पिछले पांच दिनों में कुछ प्रत्याशी पांच से छह लाख रुपए तक खर्च कर चुके हैं। जगह-जगह लगे बड़े-बड़े होर्डिंग, बैनर इस बात का सबूत है कि चुनावी खर्च नियम से ज्यादा होता है।
5008 नामांकन पत्र बिके
24 से लेकर 28 फरवरी तक दून जिले में कुल 5008 नामांकन पत्रों की बिक्री हुई। देहरादून में 460 ग्राम पंचायतों और 240 क्षेत्र पंचायत सीटों पर चुनाव होने हैं।
सरकार, भाजपा पर बरसा उक्रांद
उत्तराखंड क्रांति दल ने पंचायत चुनावों के स्थगित होने को संवैधानिक अधिकारों का हनन करार दिया है। शनिवार को हुई बैठक में पदाधिकारियों ने कहा कि सरकार अपने आपसी मतभेदों के चलते चुनाव टालने की मुहिम में जुटी थी।
वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा भी चुनाव नहीं चाहती। दोनों ही दल पंचायतों एवं निकायों की स्वायत्तता के विरोधी रहे हैं।
बैठक में केंद्रीय अध्यक्ष काशी सिंह ऐरी, संरक्षक बीडी रतूड़ी, केंद्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हरीश पाठक, महामंत्री किशन मेहता, शैलेश गुलेरी, बहादुर सिंह रावत, जय प्रकाश उपाध्याय, पंकज व्यास आदि मौजूद थे।
सरकार ने पहले हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर पंचायत चुनावों को टालने का प्रयास किया। यह नहीं हुआ तो एनजीओ के जरिये सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कराई गई। सरकार चुनाव नहीं कराना चाहती तो पंचायतों को बहला करे, ताकि विकास कार्य प्रभावित न हों।
- शिव प्रसाद देवली, निवर्तमान जिला पंचायत उपाध्यक्ष