महालेखा परीक्षक उत्तराखंड (कैग) की रिपोर्ट ने आपदा के बाद सरकार की राहत वितरण की व्यवस्था को सिरे से खारिज कर दिया है।
हैरानी की बात यह है कि राहत और क्षतिपूर्ति का वितरण राज्य गठन से पहले के उत्तर प्रदेश में प्रचलित परंपरागत मानक और व्यवस्था के आधार पर ही कर दिया गया।
कैग के मुताबिक आपदा प्रबंधन की राष्ट्रीय नीति में साफ प्रावधान है कि वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार राज्य सरकार राहत के मानकों की समीक्षा भी करेगी। लेखा परीक्षा में पाया गया कि राज्य सरकार ने इसके लिए कोई कोशिश ही नहीं की।
हद तो यह है कि कैग ने जब मार्च 2015 में इस मामले में संबंधित विभागों से जवाब मांगा तो कहा गया कि राहत वितरण के मानक तैयार करने के लिए कमेटी का गठन किया गया है। इस कमेटी की अभी रिपोर्ट नहीं मिली है।
कैग ने इस जवाब को सिरे से खारिज किया। कै ग का कहना है कि राज्य गठन को 14 साल हो चुके हैं। 2005 में आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू किया जा चुका था। इतने समय में एक उपयुक्त डाटा बेस तैयार किया जा सकता था। आपदा से बहुत पहले ही तर्कसंगत और राज्य की परिस्थितियों के अनुरूप मानक तैयार किए जा सकते थे।
अधिकारियों रिपोर्टों की पड़ताल की ही नहीं
कैग के मुताबिक आपदा प्रबंधन अधिनियम में स्पष्ट है कि शुरुआती दौर में नुकसान के आकलन की जिम्मेदारी पटवारी की है। पर उनकी रिपोर्ट की पड़ताल उच्च स्तर पर भी होनी चाहिए।
लेखा परीक्षा में पाया गया कि पटवारी से ऊपर के अधिकारियों ने इन रिपोर्टों की पड़ताल की ही नहीं। इसी तरह नुकसान की भरपाई के लिए किए जा रहे भुगतान की प्रक्रिया में भी कोई चेक लिस्ट नहीं थी। इसी चेक लिस्ट के अभाव के कारण कई तरह की गड़बड़ियां और अनियमितताएं सामने आईं।
हाल ही के कुछ मामलों से जाहिर हो रहा है कि कैग ने सही सवाल उठाए हैं। रुद्रप्रयाग में कई व्यक्तियों को दो-दो बार मुआवजा मिलने के बाद सरकार को बाकायदा कैबिनेट में प्रस्ताव लाकर मुआवजा वसूली पर रोक लगानी पड़ी। दून निवासी भूपेंद्र कुमार की आरटीआई में भी सामने आया कि मुआवजा बांटने में कई तरह की अनियमितताएं हुईं।
कहीं गड़बड़ी, कहीं राहत मिली ही नहीं
कैग ने सरकारी विभागों के साथ मिलकर आपदा से प्रभावित 436 गांवों की पड़ताल की। इन गांवों की कुल जनसंख्या 3260 थी। कैग को इस पड़ताल में चौंकाने वाले नतीजे मिले। 21 गांवों में सरकार ने तात्कालिक राहत दी ही नहीं। 22 गांवों के लोग राहत वितरण से नाखुश थे।
आठ गांवों के लोगों की शिकायत थी कि आपदा के दो माह बाद भी गांवों वालों को सरकार की तरफ से राशन नहीं मिला। यह तब है जबकि आपदा प्रबंधन के तहत प्रशासन को नुकसान का त्वरित आकलन करना होता है जिससे प्रभावितों को तुरंत ही राहत उपलब्ध कराई जा सके। इसके लिए जिला प्रशासन के पास तुरंत सर्वे कराने से लेकर आकलन करने की पूरी व्यवस्था पहले से ही होनी चाहिए।
ये है आपदा राहत की बानगी
राहत की एक बानगी कैग के सामने पुलना गांव ने भी रखी। जोशीमठ के पास का यह गांव जून 2013 की आपदा में पूरी तरह से तबाह हो गया था। गांव वालों को जिला प्रशासन ने जिस राहत शिविर में जगह थी वह भी बरसात से टूट गया।
इसके बाद गांव वालों को दूसरी जगह भेजा गया। नियम यह है कि सामान्य दिनों में ही सुरक्षित स्थान का चयन कर लिया जाना चाहिए ताकि आपदा के समय प्रभावित लोगों को सुरक्षित जगह पर शरण दी जा सके। पर जिला प्रशासन ने जिस स्थान पर पुलना के लोगों को भेजा वह सुरक्षित स्थान की सूची में था ही नहीं।
उत्तरकाशी के दिदसार गांव को 2002 में ही अति संवदेनशील घोषित कर विस्थापित करने को कहा गया था। पर 2013 की आपदा के बाद जिला प्रशासन ने इस गांव में राहत शिविर ही लगा दिया। ऐसे में 115 लोगों को और जोखिम में डाला गया।
रुद्रप्रयाग के चंद्रापुरी गांव के लोगों के साथ भी यही हुआ। आपदा में तबाह हुए इस गांव के लोगों को असुरक्षित जगह पर ही विस्थापित कर दिया गया। 27 जुलाई 2013 को जब तत्कालीन जिलाधिकारी इस जगह पहुंचे तो हकीकत सामने आई।
31 गांवों को बचा सकती थी सरकार
महालेखा परीक्षक उत्तराखंड (कैग) की रिपोर्ट आपदा से पहले और बाद में हुई तमाम गड़बड़ियों के साथ ही सरकार के पुनर्वास के दावों पर भी सवाल खड़ा कर रही है। मार्च 2015 में तैयार यह रिपोर्ट बताती है कि सरकार ने समय रहते अपनी जिम्मेदारी निभाई होती तो आपदा में तबाह हुए 31 गांवों को बचाया जा सकता था।
यह गांव अतिसंवदेनशील श्रेणी में शामिल थे, कुछ गांवों का सर्वे भी हुआ, लेकिन पुनर्वास नहीं हो पाया। कैग के अनुसार इन गांवों में कृषि भूमि, भवन व अन्य ढांचागत सुविधाओं के तबाह होने से 3.50 करोड़ का नुकसान हुआ। कैग की यह रिपोर्ट अभी सदन के पटल पर रखी जानी है।
मालूम हो कि रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जून की 2013 की आपदा के बाद राहत बांटने से लेकर अन्य कई मामलों में गड़बड़ियां हुईं। कैग की रिपोर्ट से पहले सूचना का अधिकार के जरिये भी राहत कार्यों में गड़बड़ियां सामने आ चुकी हैं।
2013 की आपदा से पहले पिथौरागढ़, चमोली, टिहरी, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिले में 145 अतिसंवेदनशील गांव चिह्नित किए गए थे। इन गांवों में रहने वाले परिवारों की संख्या 4808 है। आपदा से पहले 16 गांवों का सर्वेक्षण भी किया गया, लेकिन पुनर्वास नहीं हो पाया।
जबकि, कुछ गांवों के विस्थापन के लिए सुरक्षित जमीन भी उपलब्ध थी। 15 से 17 जून 2013 के बीच हुई भारी बारिश के दौरान भूस्खलन से भारी तबाही हुई और 31 गांवों बुरी तरह से प्रभावित हुए। समय रहते पुनर्वास हो जाता तो सैकड़ों लोगों को बर्बादी से बचाया जा सकता था। वैसे राज्य में पुनर्वास की पालिसी 2011 से विद्यमान है, जिसमें प्रभावित गांवों को वन भूमि पर पुनर्वासित किए जाने का प्रावधान है।