करार तोड़कर राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों में ड्यूटी से नदारद डॉक्टरों से 18 करोड़ की वसूली नहीं हो पाई। बांड का उल्लंघन करने वाले 60 डॉक्टरों के खिलाफ वसूली की कार्रवाई करने में स्वास्थ्य विभाग हीलाहवाली करता रहा। इससे प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने का उद्देश्य विफल रहा। कैग की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है।
प्रदेश सरकार ने पहाड़ों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2008 से 2012 तक उत्तराखंड प्री-मेडिकल टेस्ट (यूपीएमटी) के माध्यम से एमबीबीएस कोर्स में प्रवेश के लिए चयनित छात्रों के बांड का प्रावधान किया था। जिसमें एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए बांड भरने वाले छात्र को रियायती दरों पर प्रति वर्ष 15 हजार रुपये देने थे। जबकि शेष राशि का भुगतान राज्य सरकार की ओर से किया गया। बांड धारक छात्र से शपथ पत्र लिया गया कि एमबीबीएस कोर्स पूरा करने के बाद पांच साल तक अनुबंध के आधार पर दुर्गम इलाकों में अनिवार्य रूप से सेवाएं देंगे।
ऐसा न करने पर वे 30 लाख का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होंगे। वर्ष 2008 व 2009 के बैच में 200 एमबीबीएस छात्रों ने बांड के माध्यम से एमबीबीएस कोर्स किया। इसमें 180 छात्रों को स्वास्थ्य महानिदेशक की ओर से दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टरों के रूप में नियुक्त किया। कैग की रिपोर्ट के अनुसार 60 डॉक्टरों ने शपथ पत्र और बांड की शर्तों का उल्लंघन किया। ज्वाइनिंग करने के बाद कुछ समय तक सेवाएं देने के बाद ड्यूटी से गायब हो गए थे। इन डॉक्टरों से 18 करोड़ रुपये की वसूली की जानी थी। लेकिन स्वास्थ्य विभाग की उदासीनता के कारण करार तोड़ने वाले डॉक्टरों से वसूली नहीं हो पाई है।
सरकार को 51.71 लाख का राजस्व नुकसान
वाणिज्य कर विभाग ने मूल्य वर्धित कर अधिनियम (वैट) में निर्धारित दर के अनुसार व्यापारियों से टैक्स की वसूली न करने से सरकार को 51.71 लाख रुपये के राजस्व का नुकसान पहुंचाया। वहीं, विभाग ने टीडीएस देरी से जमा करने पर व्यवसायी से 0.59 करोड़ के अर्थदंड और ब्याज की वसूली नहीं की। कैग रिपोर्ट में विभागीय अधिकारियों की लापरवाही उजागर हुई है।
वैट प्रणाली में ट्रेड रबर (टायर एवं ट्यूब की रिट्रेडिंग के लिए प्रयोग होना वाला) पर 13.5 प्रतिशत टैक्स निर्धारित है। कैग ने वर्ष 2017-18 के दौरान 72 टैक्स अभिलेखों की जांच की। जिसमें पाया गया कि वर्ष 2012-13 से 2014-15 के कर निर्धारण में चार व्यापारियों के पांच मामलों में निर्धारित टैक्स दर की जगह पांच व साढ़े चार प्रतिशत के हिसाब से टैक्स वसूला गया। इन मामलों में विभाग ने 26.12 लाख रुपये का कम टैक्स वसूल किया। इसी तरह एलईडी बल्ब, एलईडी ट्यूब और पैनल्स पर पांच प्रतिशत की दर से टैक्स वसूला गया है।
जबकि इन उत्पादों पर वर्गीकृत वस्तुओं की बिक्री की भांति 13.5 प्रतिशत की दर से टैक्स लिया जाना चाहिए। 8.5 प्रतिशत से कम दर से टैक्स वसूलने से 25.59 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। वहीं, चावल के आटे की बिक्री पर 13.5 प्रतिशत की दर कर वसूलने की जगह विभागीय अधिकारियों ने कर मुक्त बिक्री मान लिया। इससे 8.59 लाख रुपये कम टैक्स प्राप्त हुआ है।
स्टोन क्रशर मालिकों पर खनन विभाग ने मेहरबानी दिखाई है। जून 2017 से मार्च 2018 के बीच खनन विभाग ने 26 स्टोन क्रशर मालिकों से विनियमितीकरण और पंजीकरण शुल्क नहीं वसूला। इससे सरकार को 1.86 करोड़ रुपये के राजस्व की हानि हुई है। कैग रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। वहीं, विभाग ने रायल्टी की गणना गलत दर से करके 32.74 लाख की रायल्टी कम वसूली है।
प्रदेश सरकार ने पर्यावरण संरक्षण और अवैध खनन को रोकने के लिए वर्ष 2016 में स्टोन क्रशरों के लिए नई लाइसेंस नीति लागू की थी। इस नीति के अनुसार पूर्व में स्थापित स्टोन क्रशर मालिकों को नीति की अधिसूचना जारी होने के 15 दिन के अंदर प्लांट की क्षमता को घोषित करना था। नीति में मैदानी क्षेत्रों में 100 टन क्षमता के क्रशर के लिए आवेदन शुल्क 10 लाख और पर्वतीय क्षेत्रों में पांच लाख रुपये निर्धारित है। वर्ष 2017-18 के दौरान कैग ने 171 स्टोन क्रशर इकाईयों के दस्तावेजों की जांच की।
हरिद्वार, देहरादून, हल्द्वानी (नैनीताल) और पौड़ी जिले की जांच में पाया गया कि 26 स्टोन क्रशर मालिकों से 1.21 करोड़ का विनियमितीकरण शुल्क और 0.65 करोड़ वार्षिक नवीनीकरण शुल्क नहीं वसूला गया। वहीं, हरिद्वार में दो और पौड़ी में एक भंडारकर्ता से खनिज भंडारण के लिए निर्धारित शुल्क की वसूली न करने से 3.17 करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ है। विभाग ने खनन पट्टों पर रिवर ट्रेनिंग, विकास शुल्क, क्षतिपूर्ति शुल्क से प्राप्त 59.68 लाख रुपये की धनराशि जिला खनिज फाउंडेशन में कम जमा किया है। इस रािश को खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास कार्यों पर खर्च किया जाता है।
सामाजिक कल्याण योजनाओं में वितरित किया 12.94 करोड़ ऋण
प्रदेश सरकार की विभिन्न सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं में लाभार्थियों को ऋण में दिए गए 12.94 करोड़ की वसूली नहीं हो पाई है। उत्तराखंड बहुउद्देशीय वित्त एवं विकास निगम ने अतिरिक्त ब्याज से बचने के लिए अपने संसाधनों से राष्ट्रीय स्तर के निगमों को 8.29 करोड़ का भुगतान कर दिया। लेकिन लाभार्थियों को दिए गए ऋण की वसूली नहीं कर पाया। वहीं, अनुचित वित्त प्रबंधन के कारण निगम ने 1.14 करोड़ का अतिरिक्त ब्याज अर्जित करने का मौका गंवाया है।
कैग की रिपोर्ट के अनुसार योजनाओं को संचालित करने के लिए सरकार ने वित्त एवं विकास निगम को ऋण उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय निगमों को गारंटी दी थी। निगम के माध्यम से 2001-02 से लेकर 2016-17 तक 23.27 करोड़ का उधार लिया गया। जिसमें सभी जिलों में लाभार्थियों को 18.47 करोड़ का ऋण वितरित किया गया। कुल 1383 डिफाल्टर लाभार्थियों में 313 के खिलाफ रिकवरी सर्टिफिकेट जारी की गई।