एक तरफ प्रदेश सरकार वनों की सुरक्षा में करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। वहीं दूसरी तरफ, वन विभाग लापरवाही के चलते कमाई के थोड़े बहुत अवसर भी गंवा रहा है। इसी का परिणाम रहा कि 530.47 करोड़ रुपये की कमाई भी वन विभाग ने गंवा दी। कैग रिपोर्ट के मुताबिक वन विभाग समय से कई वर्किंग प्लान बनाने में असफल रहा। हद तो यह हुई कि विभाग ने साल के जंगलों की छंटाई के लिए कोई योजना नहीं बनाई। प्रदेश में साल की लकड़ी का वन विभाग व्यवसायिक उपयोग की इजाजत देता है। साल के पेड़ को पर्याप्त सूर्य की रोशनी चाहिए होती है।
ऐसे में छंटाई न होने से साल के जंगलों की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। कैग ने वन विभाग की आंतरिक लेखा परीक्षा पर भी सवाल उठाया है। कैग ने पाया कि 11 वन प्रभागों में 19.05 करोड़ रुपये के एरियर की वसूली नहीं हुई। आठ वन प्रभागों में 2308 अपराध के मामले विभागीय स्तर पर लंबित थे। 1025 मामले तो ऐसे थे, जिनमें कार्यवाही तीन साल से लंबित थी।
11 वन प्रभागों में 9053.21 हेक्टेयर वन भूमि पर अतिक्रमण था। 125.56 हेक्टेयर अतिक्रमित वन भूमि को नियमित करने की कार्यवाही 2001 में शुरू हुई थी। 121 मामलों में तो अदालत ने अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था लेकिन विभाग ने कोई कार्यवाही नहीं की। जनवरी 2019 में वन विभाग ने बताया था कि अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही की जा रही है।
मुख्य बिंदु...
1. वर्किंग प्लान समय से बनाने में वन विभाग असफल रहा। दस साल के लिए बनने वाले इस वर्किंग प्लान के आधार पर ही वनों में विभाग काम कर पाता है। कैग ने पाया कि 24 वर्किंग प्लान समय से नहीं बनाए गए। इससे दो वन प्रभागों में पेड़ नहीं काटे जा सके और विभाग को 75.37 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
2. साल के जंगलों में केनोपी ऑपनिंग (पेड़ों की छंटाई) न होने से 320.12 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ और इससे नए साल के पेड़ों के विकास पर भी बुरा प्रभाव पड़ा ।
3. रायल्टी में 42.18 करोड़ रुपये का नुकसान।
4. 2013 से 2018 के बीच यूके लिप्टस पेड़ों की गलत रायल्टी निर्धारण के कारण 31.19 करोड़ रुपये का नुकसान।
5. वन विकास निगम ने जलौनी लकड़ी की नीलामी में 13.94 करोड़ रुपये और पेड़ों की जड़ों की नीलामी से 42.17 करोड़ रुपये कमाएं। निगम को यह पैसा मिल ही नहीं पाया।
6. बदरीनाथ और टिहरी वन प्रभाग चीड़ के पेड़ों से मिलने वाले रेजिन को समयबद्ध रूप से निकालने की व्यवस्था नहीं कर पाया। इस वजह से 2.39 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
7. वर्किंग प्लान में चीड़ पेड़ों से रेजिन निकालने के लिए व्यवस्था न होने के कारण विभाग को 2.47 करोड़ रुपये हर साल का नुकसान उठाना पड़ा।
8. उपखनिज पर परिवहन शुल्क के गलत निर्धारण के कारण विभाग को 72.27 लाख का नुकसान हुआ।
9. आठ लीज मामलों में 417.95 करोड़ रुपये वसूल करने में विभाग असफल रहा।
अफसर अधिक, फील्ड में काम करने वाले कम
वन विभाग में प्रमुख वन संरक्षक स्तर के अधिकारियों की अधिकता है और वन क्षेत्राधिकारियों, वन रक्षकों की कमी है। कैग ने माना कि फील्ड में कर्मियों की कमी के कारण वन विभाग अवैध रूप से पेड़ों के कटान, वन क्षेत्र में अवैध खनन जैसे मामलों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं कर पा रहा है।