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पौड़ी: सवारियों से भरी बस खाई में गिरी, 7 की मौत, 23 घायल

Tue, 10 Nov 2015 08:25 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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कोटद्वार-पौड़ी नेशनल हाईवे पर गूमखाल से चार किमी आगे बैरगांव के पास जीएमओयू की बस के गहरी खाई में जा गिरी। हादसे में सात लोगों की मौत हो गई और 23 घायल हो गए। पांच मृतकों की शिनाख्त हो गई है। बस चालक फरार बताया जा रहा है। सभी लोग दीपावली की छुट्टी के चलते गांव जा रहे थे।
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कोटद्वार जीएमओयू बस अड्डे से 11 बजे चौबट्टाखाल के गडरी के लिए रवाना हुई बस में तीस सवारियां बैठी थीं। करीब साढ़े बारह बजे बस गूमखाल से चार किमी आगे बैरगांव के पास अचानक अनियंत्रित होकर ढाई सौ मीटर गहरी खाई में जा गिरी।

सूचना मिलते ही एसडीएम सोहन सिंह सैनी, एसओ चंद्रमोहन सिंह, सीओ बचन सिंह राणा मय फोर्स मौके पर पहुंचे और घायलों को खाई से निकालकर सड़क तक लाए। पुलिस प्रशासन से पहले बैरगांव, गहड़खाल, गूमखाल बाजार, सोलिया गांव और कोटलमंडा के ग्रामीण घटनास्थल पर पहुंचकर राहत और बचाव कार्य शुरू कर चुके थे।
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सेना के जवानों ने चलाया रेस्क्यू, मृतकों को मिलेंगे एक लाख

जिलाधिकारी चंद्रशेखर भट्ट ने बताया कि हादसे में राहत और बचाव कार्य में लैंसडौन से सेना के जवानों और अधिकारियों की मदद ली गई। सरकार की ओर से मृतक आश्रितों को एक लाख रुपये, गंभीर घायल को 50 हजार रुपये और सामान्य घायल को 20 हजार रुपये की सहायता देने की घोषणा की गई है। डीएम ने दुर्घटना की मजिस्ट्रीयल जांच के आदेश दिए हैं।

एसडीएम सोहन सिंह सैनी ने बताया कि घायलों को कोटद्वार और लैंसडौन के अस्पतालों में भर्ती कराया गया। पांच लोगों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई, जबकि दो ने अस्पताल ले जाते वक्त रास्ते में दम तोड़ा। तीन घायलों को कोटद्वार सरकारी अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया है।

घटनास्थल पर एक ढाई साल का बालक सुरक्षित मिला है, जो अपना नाम आदि बता रहा है। बच्चे को कोटलमंडा गांव की निवासी रंजना के परिवार में देखभाल के लिए सौंपा है। घटनास्थल पर पहुंचे पुलिस अधीक्षक ने बाद में राहत और बचाव कार्य की कमान खुद संभाल ली। जिला पंचायत अध्यक्ष दीप्ति रावत, कांग्रेस नेत्री ज्योति रौतेला भी घटनास्थल पर पहुंच गई।

ढाई साल का आदि पुकारता रहा बस मां-मां

दुर्घटना में काल का ग्रास बनी एकेश्वर ब्लाक के ग्राम सिमार की डौली पत्नी दिलबर सिंह अपने दो बेटों नैतिक और आदित्य के साथ बस से दीवाली मनाने गांव जा रही थी। डौली को क्या पता था कि यह उसके जीवन का आखिरी सफर होगा। दुर्घटना में सही सलामत बचे दो वर्षीय आदित्य उर्फ आदि का रो-रोकर बुरा हाल था। वह सिर्फ अपनी मां को पुकार रहा था।

दुर्घटना के घंटों बाद आदित्य की पहचान की जा सकी। तब तक दुर्घटना स्थल के निकट कोटलमंडा गांव के एक परिवार ने उसे दूध पिलाया, वह बार बार अपनी मां को पुकारकर रोता रहा।

जाको राखे सांईयां मार सके ना कोय...
जाको राखे सांईयां मार सके ना कोय....यह कहावत कस्याणी की सुषमा देवी पर तब चरितार्थ हो गई, जब वह इस बस में कोटद्वार से अपने गांव कस्याणी के लिए सवार हुई। सुषमा देवी का घर दुर्घटना स्थल से महज बीस मीटर आगे है। वह कस्याणी का टिकट लेने के बावजूद दुर्घटनास्थल से महज एक किमी पहले अपने मायके सोलिया में ही अचानक अपने भाई से मिलने के लिए उतर गई। इस तरह सुषमा दुर्घटना का शिकार होने से बच गईं।

यूसुफ के परिवार में मचा कोहराम
कस्बे में तीन दशक से अधिक समय से सब्जी एवं फ्रूट का व्यवसाय कर रहे मो. यूसुफ (46) पुत्र यामीन चौधरी की दुर्घटना में हुई अकाल मौत के बाद उनके घर में कोहराम मचा है। वे घर के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। पत्नी शमशीदा समेत अबोध बच्चों का रो रोकर बुरा हाल है। उनके परिवार पर टूटे इस कहर से कस्बे में भी मातम पसरा हुआ है।
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डेंजर जोन पर पर हवा हुई बैंबू फेसिंग

गुमखाल-सतपुली मोटर मार्ग समेत सूबे के तीन मार्गों नैनीताल-काठगोदाम और काठगोदाम-भीमताल पर वर्ष 2009 में दुर्घटनाओं में जानमाल का नुकसान कम करने के लिए बैंबू फेंसिंग करवाई गई थी। तब इस मार्ग पर दो वर्षों के भीतर 18 से अधिक दुर्घटनाओं में 25 लोग काल के गाल में समा गए थे। बावजूद इसके विभागीय लापरवाही और ग्रामीणों के असहयोग से राज्य सरकार की यह महत्वाकांक्षी परियोजना परवान नहीं चढ़ सकी।

हिमाचल की तर्ज पर खतरनाक एवं ढालदार संकरी सड़कों पर बैंबू फेसिंग से काफी हद तक जान माल का नुकसान कम किया जा सकता है। विभाग ने एक बार बैंबू लगवाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ ली। वहीं विभाग द्वारा लगवाए गए बैंबू को ग्रामीण ईंधन आदि के लिए काटकर लेड गए जिससे हालात जस के तस बने हुए हैं।

क्या है बैंबू फेसिंग
बैंबू फेसिंग के तहत डेंजर जोन में सड़क के नीचे खाई की ओर बांस की पौध 2-2 फीट के गैप में चार-पांच कतारों में रोप दी जाती है। दो-तीन वर्षों में यह बांस बड़े हो जाते हैं। इससे वाहन दुर्घटना की स्थिति में वाहन गहरी खाई में न गिरकर बांस के इन झुंडों में अटक जाता है। इससे जान-माल का नुकसान बेहद कम होता है। चीन समेत दुनिया के कई देशों में दुर्घटनाओं में जान-माल का नुकसान कम करने की यह बेहद लोकप्रिय तकनीक है।
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