अनुभवी अफसरों की एक टीम
इससे पहले मंत्री ही सचिवों की एसीआर लिखते थे। अमर उजाला से नाम गोपनीय रखने की शर्त पर कुछ नौकरशाहों ने इस मसले पर अपनी राय साझा की। उनका मानना है कि मुख्यमंत्री के पास अधिकार होना इसलिए व्यावहारिक है, क्योंकि उनके पास अनुभवी अफसरों की एक टीम होती है, जिनसे वे रायशुमारी करने के बाद सही निर्णय पर पहुंच सकते हैं। वे यह भी कहते हैं कि मंत्रियों को यह लगता है कि एसीआर का अधिकार होने से नौकरशाही उनके इशारे पर थिरकेगी। वे जो चाहे वो करा सकेंगे।
एसीआर बिगड़ी तो कैरियर खराब
नौकरशाहों के कैरियर में एसीआर के खास मायने हैं। एसीआर की बदौलत ही वे केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के योग्य बनते हैं। एसीआर खराब होने पर उनके कैरियर में रुकावट का खतरा बन जाता है।
महाराज ने छेड़ा अभियान
कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने मंत्रियों की एसीआर लिखने के अधिकार पाने की जिद पकड़ रखी है। त्रिवेंद्र-तीरथ सरकार से लेकर धामी सरकार तक वह यह मांग उठाते रहे हैं। एक तरह से उन्होंने इसके लिए अभियान छेड़ रखा है। इन कालखंड़ों में उनकी अपने विभाग के सचिवों से तनातनी रही है। वर्तमान में भी वह अपने विभागीय सचिव की कार्यशैली से खुश नहीं माने जा रहे हैं। जानकारों का मानना है कि मंत्री अपने सचिवों को काबू में रखने के लिए एसीआर की लगाम चाहते हैं। मंत्रियों का तर्क है कि बेलगाम नौकरशाही के लिए उन्हें अधिकार मिलना चाहिए।
ये भी पढ़ें...Chardham Yatra: बाबा केदार और मां गंगा की डोली चली अपने धाम, यात्रा के आगाज के साथ देखें देवभूमि का ये रंग
दुरुपयोग न हो तो दिया जा सकता है अधिकार
पूर्व नौकरशाह इंदु कुमार पांडेय कहते हैं कि केंद्र सरकार और उत्तरप्रदेश सरकार में सचिवों की एसीआर मंत्री ही लिखते हैं। सैद्धांतिक रूप से यह बात सही है कि मंत्री ही सचिवों का बॉस है। उन्हें उनके फैसलों को बदलने का अधिकार है। लेकिन यह भी देखना होगा कि यह कितना व्यावहारिक है। जिन राज्यों में सचिवों की एसीआर मंत्री लिख रहे हैं, वहां की व्यवस्था का अध्ययन कर लेना चाहिए। यह जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं।