प्रदेश सरकार अब हिमालयी क्षेत्रों में बुग्यालों का अलग से अध्ययन कराने की तैयारी कर रही है। इसके लिए वैज्ञानिक संस्थाओं से आग्रह किया गया है कि वे अध्ययन कर बताएं कि प्रदेश में कहां-कहां बुग्याल हैं और क्या उच्च हिमालयी क्षेत्र में हर घास के मैदान को बुग्याल कहा जा सकता है।
कुछ समय पहले ही हाईकोर्ट ने प्रदेश में बुग्यालों में रात्रि विश्राम पर रोक लगा दी थी। ऐसे में सबसे अधिक बुग्यालों का ट्रेक करने वाले पर्यटक प्रभावित हुए। खुद प्रदेश सरकार का कहना है कि इससे करीब आठ करोड़ रुपये का नुकसान हो गया है। उत्तराखंड की ओर रुख करने वाले पर्यटक हिमाचल की ओर रुख कर रहे हैं।
पर्यटन विभाग का कहना है कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में हर तरह के घास के मैदान को बुग्याल माना जा रहा है। ऐसे में औली की ओर रुख करने वाले पर्यटक भी प्रभावित हुए हैं और प्रदेश सरकार को इससे नुकसान हो रहा है। सिंचाई विभाग की ओर से हाल ही में ग्लेशियर के अध्ययन के लिए आयोजित की गई कार्यशाला में भी यह मुद्दा उठा था। पर्यटन एवं सिंचाई मंत्री सतपाल महाराज के मुताबिक बुग्यालों को परिभाषित किया जाना जरूरी है। बुग्यालों के नाम पर पर्यटकों को रोका जा रहा है इससे प्रदेश का पर्यटन प्रभावित हो रहा है।
औली बुग्याल है या नहीं
प्रदेश के सबसे बड़े बुग्याल माने जाते औली को लेकर खुद हाईकोर्ट ने जीबी इंस्टीट्यूट से पूछा था कि वह बताए कि औली बुग्याल है या नहीं। कुछ समय पहले ही औली में एक विवाह समारोह आयोजित करने को लेकर हाईकोर्ट में यह मामला पहुंचा था और उस समय कहा गया था कि औली को बुग्याल मानना सही नहीं है।
मौसम के बदलाव का भी प्रभाव
कुछ समय पहले ही जीबी पंत हिमालयन संस्थान की ओर से किए गए अध्ययन में यह सामने आया था कि मौसम में बदलाव के कारण ट्री लाइन उच्च हिमालय क्षेत्रों में ऊंचाई की ओर शिफ्ट हो रही है। संस्थान ने तुंगनाथ क्षेत्र का अध्ययन किया और पाया कि 270 साल में यहां ट्री लाइन ऊंचाई की ओर करीब 350 मीटर तक बढ़ गई। माना गया कि इसकी एक वजह सर्र्दियों में तापमान की वृद्धि भी है।
माना जाता है कि प्रदेश के हिमालयी क्षेत्र में बुग्याल 3300 मीटर से लेकर 4000 मीटर तक की ऊंचाई पर पाए जाते हैं। ये घास के मैदान होते हैं जिनमेें पेड़ नहीं होते। आली, बेदनी, दयारा, औली आदि बड़े बुग्यालों में गिने जाते हैं। औली अपवाद स्वरूप 3050 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।