अपने कुनबे को संभाल न पाने का नुकसान अब हरिद्वार में बसपा को उठाना पड़ सकता है।
पार्टी के नेता बसपा से अलग हुए धड़े के नेताओं को आधारहीन बता कर फिलहाल संतुष्ट हो रहे हैं।
दूसरी ओर, हकीकत यह भी है कि बसपा की दूसरी पांत के नेताओं के कांग्रेस की ओर रुख करने से पार्टी को नुकसान की पूरी आशंका बन रही है।
नेताओं के जाने से बसपा पर नहीं पड़ेगा फर्क
बसपाइयों का दावा रहा है कि नेताओं के इधर-उधर हो जाने से बसपा के आधार को कोई फर्क नहीं पड़ता।
कारण यह कि बसपा अपने वोट बेस को कैडर बेस मानती है। पर वोट बेस से इधर पार्टी की भी अपनी डायनामिक्स है।
प्रदेश में बसपा का सबसे मजबूत आधार हरिद्वार में है। बसपा की सोशल इंजीनियरिंग की तूती भी यहीं बोलती है।
पर पिछले कुछ सालों से बसपा केटिकट पर जीतकर सत्ता के गलियारों में पहुंच रहे जनप्रतिनिधि किसी न किसी कारण से बसपा से देर सवेर अलग भी हो जा रहे हैं।
हैवीवेट नेताओं को पार्टी से कर दिया अलग
इस बार भी ठीक चुनाव से पहले कैबिनेट मंत्री सुरेंद्र राकेश और बसपा विधायक दल के नेता हरिदास को पार्टी से निलंबित कर दिया गया।
बसपा के प्रदेश अध्यक्ष मेघराज जरावरे का कहना है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
पर खुद कई बसपाई यह मान रहे हैं कि बसपा के वोट बेस को भले ही कोई फर्क न पड़े पर पार्टी को तो फर्क पड़ ही रहा है।
ऐन चुनाव के समय पार्टी को ज्यादा से ज्यादा ऐसे लोगों की दरकार भी है जो अलग-अलग स्थानों पर मोर्चा ले सके।
बसपा में सेंधमारी करना कांग्रेस की मजबूरी
विशलेष्क इसका एक कारण मुस्लिम और दलित मतों के ध्रुवीकरण करने की राजनीतिक दलों की कोशिश को भी मान रहे हैं।
मुस्लिम और दलित मतों पर कांग्रेस की भी निगाह है। लिहाजा बसपा में सेंधमारी करना कांग्रेस की मजबूरी बन रही है।
दूसरी ओर बसपा की अंदरूनी कलह कांग्रेस के लिए यह काम आसान कर रही है।