उत्तराखंड में नए शिक्षा सत्र शुरू होने के दस दिन बाद भी सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले साढ़े सात लाख से अधिक बच्चों को अधिकतर किताबें नहीं मिल पाई हैं। राजधानी देहराददून में अब तक बच्चों को 50 फीसदी पुस्तकें नहीं मिली हैं।
इससे पहाड़ के दूरदराज के स्कूलों तक किताबें कब पहुंचेंगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। वहीं, शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे निजी स्कूलों को किताबें उपलब्ध कराने का दावा कर रहे हैं। सवाल यह है कि जब विभाग अपने ही स्कूलों को समय पर किताबें नहीं उपलब्ध करा पा रहा हैं, तो निजी स्कूलों को किताबें कैसे देगा?
शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे का कहना है कि प्रदेश में सरकारी और गैर सरकारी स्कूलों में एक समान पाठ्यक्रम लागू किया जाएगा। गैर सरकारी स्कूलों में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) से निर्धारित किताबें लगाई जाएंगी। सरकार यह किताबें उपलब्ध कराएगी, लेकिन पहले से सरकारी स्कूलों के बच्चों को निशुल्क उपलब्ध कराई जाने वाली किताबें अब तक स्कूलों में निर्धारित समय पर नहीं मिल पा रही हैं।
इससे प्रदेश के कक्षा एक से आठवीं तक के लाखों बच्चे बगैर पाठ्य पुस्तकों के लौट रहे हैं। दून में ही कक्षा एक से पांचवीं तक के बच्चों को 24 में से 17 किताबें मिल पाई हैं। वहीं, जूनियर हाईस्कूलों में 30 से मे 11 किताबें स्कूलों तक पहुंच पाई हैं। प्राथमिक शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष वीरेंद्र कृषाली के मुताबिक विभागीय अधिकारियों की लापरवाही से बच्चों को समय पर किताबें नहीं मिल पा रही हैं। इस तरह के अधिकारियों के खिलाफ जवाबदेही तय कर कार्रवाई होनी चाहिए।
कुछ विषयों को छोड़कर अधिकतर किताबें जनपदों में पहुंचा दी गई हैं, जनपद स्तर से इसमें देरी हो सकती है। मैं मामले की जांच कराकर दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करूंगी।
- सीमा जौनसारी, शिक्षा निदेशक