हौसले बुलंद हो तो सफलता खुद कदम चूमती है। संग्राली गांव की जन्मांध रेनू भट्ट को देखकर तो यही कहा जा सकता है।
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वर्तमान में दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक कर रही रेनू न सिर्फ घर के रोजमर्रा के काम करती है, बल्कि शॉर्ट हैंड, टाइपिंग एवं कंप्यूटर में भी सिद्धहस्त है।
जन्मांध है रेनू
आईटीबीपी में उपनिरीक्षक संग्राली गांव निवासी जय किशन भट्ट के पांच बच्चों में सबसे छोटी रेनू को जन्म से ही कुछ दिखाई नहीं देता है। जन्मांध बेटी के लिए परेशान अभिभावक उसे स्कूल में भर्ती करने का निर्णय भी नहीं ले पाए।
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सात साल की उम्र में उसे देहरादून के शार्प मेमोरियल स्कूल फॉर ब्लाइंड में दाखिला दिलाया। इसके बाद रेनू ने देहरादून के ही चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया स्कूल से हाईस्कूल तथा राष्ट्रीय दृष्टि बाधितार्थ संस्थान से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की।
इसी दौरान उसने स्टेनोग्राफी से डिप्लोमा भी लिया। शॉर्ट हैंड में उनकी स्पीड 80 और हिंदी टाइपिंग में 30 शब्द प्रति मिनट है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी से कर रही हैं स्नातक
अब दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी, अंग्रेजी और आईटी विषय के साथ स्नातक कर रही रेनू वहां सामान्य छात्राओं के साथ हॉस्टल में रहती है।
शिक्षा में कंप्यूटर के महत्व को समझते हुए उन्होंने छह माह पहले अपने सहपाठी राजू की मदद से फोन पर ही कंप्यूटर के बारे में जानकारी हासिल की। अब जॉज सॉफ्टवेयर की मदद से वह आसानी से कंप्यूटर पर काम करती है।
घर के कामों में भी बंटाती है हाथ
रेनू की मां कीर्तेश्वरी भट्ट बताती हैं कि छुट्टी में जब वह घर आती हैं, तो घर के कामों में भी हाथ बंटाती है। रेनू घर की साफ-सफाई, खाना बनाना, धान की कुटाई, बुनाई आदि भी आसानी से कर लेती है।
पिता जय किशन का कहना है कि बचपन में रेनू के भविष्य की चिंता रहती थी, लेकिन शिक्षा अर्जन के साथ उसका आत्मविश्वास बढ़ने पर अब उन्हें भी विश्वास है कि लक्ष्य हासिल करने में कोई रुकावट आड़े नहीं आएगी।
पर्वतारोहण प्रशिक्षण भी लिया
पढ़ाई एवं काम के सिलसिले में देहरादून, दिल्ली जैसे शहरों में आसानी से आवाजाही करने वाली रेनू के सामने पहाड़ भी बाधा नहीं हैं।
वर्ष 2010 में उसने एनआईएम से सात दिन का विशेष पर्वतारोहण प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। इस दौरान उन्होंने तेखला में खड़ी चट्टानों पर सफलतापूर्वक आरोहण किया।