मन की आंखों से दुनिया को देखने वाले कई दृष्टिबाधित बच्चे आने वाले दिनों में अपनी आंखों से देख सकेंगे। यह बात भले ही आपको हैरानी भरी लग रही हो, लेकिन नैब के 78 दृष्टिबाधित बच्चों की आंखों की जांच में यह सामने आई कि इनमें से 23 बच्चों के उपचार के बाद उनकी आंखों की रोशनी लौट सकती है।
जांच में यह बात भी सामने आई कि माता-पिता की लापरवाही की वजह से ज्यादातर बच्चों की रोशनी धीरे-धीरे बेहद कम हो गई और वे दिव्यांग की श्रेणी में आ गए।
सोमवार को नयना ज्योति समिति के सहयोग से गौलापार स्थित नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड (नैब) में आयोजित निशुल्क जांच एवं उपचार शिविर में 78 दृष्टिबाधित बच्चों की आंखों की जांच की गई।
मेरठ से आए वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ. विनोद तिवारी ने जांच के बाद दावा किया कि इनमें 23 बच्चे की जाम हो चुकी आंखें खुल सकती हैं और कई सामान्य बच्चों की श्रेणी में आ सकते हैं।
लेजर उपचार और चश्मे से रोशनी होगी वापस
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उन्होंने बताया कि कई बच्चों की सुस्त पड़ चुकी आंखों (लेजी आई) को लेजर उपचार और चश्मा देकर जरूरत के मुताबिक रोशनी आ सकती है। एक दृष्टिबाधित बच्ची के कार्निया का ऑपरेशन करने के बाद ज्यादा संभावना है कि उसकी रोशनी वापस आ जाएगी।
उन्होंने सुझाव दिया कि सामाजिक सुरक्षा के लिए यूजफुल विजन आने के बाद भी इन बच्चों के समुचित विकास के लिए दृष्टिबाधित स्कूल में ही रखना ठीक होगा।
नैब के संचालक श्याम धानक ने कहा कि इस शिविर के जरिए कई दृष्टिबाधित बच्चों की रोशनी लौटने की उम्मीद जगी है। उन्होंने बताया कि जिन बच्चों की आंखें ऑपरेशन के ठीक हो सकती हैं, उनके खर्च की व्यवस्था का आश्वासन कुमाऊं विवि के पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. गिरीश रंजन तिवारी ने दिया है। शिविर लगाने में विनोद पांडे, राजीव लोचन साह, दीप सनवाल, मनोज साह का भी सहयोग रहा।
दिव्यांगता के लिए गर्भवती महिलाएं भी जिम्मेदार
गर्भवती महिला
- फोटो : file photo
डॉ. विनोद तिवारी ने बताया टेरोटोजेनिक इफेक्ट के चलते भी दृष्टिबाधित बच्चे पैदा होते हैं। गर्भ के दौरान कई महिलाएं जरूरत से ज्यादा पेन किलर, एंटीबायोटिक, मेट्रोजिल आदि दवाएं लेती हैं, जिसका असर गर्भ में पल रहे बच्चों पर अंगों के विकास पर पड़ता है। इसके अलावा बच्चे के जन्म के बाद उसे ऑक्सीजन देने से भी बाद भी उनकी आंखों पर असर होता है। डॉ. तिवारी ने सुझाया कि शिशु के जन्म के हफ्ते भर के भीतर उसकी आंखों की जांच करानी चाहिए, ताकि दृष्टिबाधित होने की नौबत न आए।
एसटीएच के आई बैंक को किसने लटकाया
उत्तराखंड में आई बैंकों की स्थापना के लिए अधिकृत अधिकारी होने के नाते डॉ. विनोद तिवारी से यह पूछा गया कि एसटीएच, हल्द्वानी में अब तक आई बैंक स्थापित क्यों नहीं हुआ। तब उन्होंने कहा कि डॉ. तितिलियाल को छोड़कर किसी ने इसमें रुचि नहीं ली। ऊपर से ही अड़ंगा लगा हुआ है।