धर्मनगरी हरिद्वार का एक काला पक्ष भी है। पिछले चार दशकों में काला धन खपाने की सबसे बड़ी फैक्ट्री के रूप में यह उभरी है।
हैरतअंगेज ढंग से संतों-महंतों के आश्रम काले धन को गोरा करने में शामिल रहे हैं। गौरतलब है कि कालेधन के खिलाफ अभियान चला रहे बाबा रामदेव खुद हरिद्वार में रहते हैं।
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि धारा 80 जी के तहत धार्मिक संस्थाओं को दान देने पर मिलने वाली आयकर का छूट 880 धार्मिक संस्थाएं उठा रही हैं। इनमें से कौन सही हैं, कौन गलत इसका निर्धारण करने की भी कोई व्यवस्था नहीं है।
संतों-महंतों की शरण में पहुंचे उद्योगपति
बताते हैं कि (1975-77) देश में आपातकाल लगा था। छापों के डर से बड़े-बड़े उद्योगपति अपना कालाधन लेकर हरिद्वार के संतों-महंतों की शरण में पहुंच गए।
आयकर की धारा 80जी का लाभ उठाते हुए अरबों का कालाधन धर्मनगरी में खप गया। संतों-महंतों को भी खूब लाभ हुआ। इसी वक्त से हरिद्वार में अट्टालिकाएं खड़ी करने का दौर शुरू हुआ। कई कुटिया महल बन गई, छोटे-छोटे आश्रम फाइव स्टार।
बड़े उद्यमियों ने आश्रमों को खड़ा किया
पिछले 40 वर्षों में हरिद्वार की समृद्धि देखने योग्य है। निश्चय ही दान को आयकर की धारा से जोड़कर भारी मुनाफा कमाया गया है। बड़े-बडे़ उद्यमियों ने हरिद्वार के आश्रमों को खड़ा करने में योगदान दिया है। यह धन काला है या सफेद, किसी को मालूम नहीं।
-श्रीमहंत ज्ञानदास, अध्यक्ष अखाड़ा परिषद्
ईमानदारी की कमाई से यह विकास संभव नहीं
बीते 40 वर्षों से धन की बाढ़ हरिद्वार में आई। निसंदेह इसके पीछे कालाधन है। आपातकाल में तो बेशुमार कालाधन हरिद्वार में खपाया गया। जिस किस्म का विस्तार हरिद्वार में आज भी लगातार हो रहा है, वह ईमानदारी की कमाई से नहीं हो सकता।
-अशोक त्रिपाठी, अध्यक्ष गंगा सभा, पूर्व उपाध्यक्ष मेला प्राधिकरण