उत्तराखंड में कांग्रेस को संकट में डालकर भाजपा में शामिल हुए दस बागी विधायकों के टिकट बंटवारे को लेकर भाजपा में संकट उत्पन्न हो गया है।
ज्यादातर बागी विधायकों ने अपनी मौजूदा सीट से टिकट की मांग की है, जबकि इन स्थानों में से ज्यादातर पर भाजपा प्रत्याशी मामूली अंतर से हारे हैं। ऐसे में वे किसी भी सूरत में अपनी सीट छोड़ने को तैयार नहीं है। ऐसे में भाजपा के लिए एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाईं वाली स्थिति हो गई है।
बीती 18 मार्च को विनियोग विधेयक की मुखालफत करते हुए भाजपा में आए नौ बागी विधायकों को टिकट देने के मुद्दे पर अंदरखाने रार मच गई है। सूत्रों के मुताबिक, पूर्व में इन्हें अपनी मौजूदा सीटों से भाजपा का टिकट दिए जाने की बात हो चुकी थी।
अब चुनाव नजदीक देख टिकट घोषित किए जाने का दबाव संगठन पर बढ़ गया है। ज्यादातर बागी विधायकों ने अपनी मौजूदा सीट से टिकट मांगा है। अपने वादे से बंधा संगठन इन्हें इनकार करने में असहज हो रहा है। मुख्यमंत्री के चेहरे के संकट से जूझ रही भाजपा के पास इस चुनाव में विरोधी दल के खिलाफ कोई बड़ा मुद्दा भी नहीं है, जिससे पार्टी कांग्रेस पर हमलावर हो सके।
वहीं ज्यादातर बागियों के दोबारा चुनाव में जीतने की उम्मीद लगाए बैठे पदाधिकारी इन्हें टिकट देने से इनकार करके नाराज करने की स्थिति में भी नजर नहीं आ रहे हैं। इसके चलते इन सीटों पर दावेदारी करने वाले भाजपा प्रत्याशियों की मानमनौव्वल की जा रही है। मगर मामूली अंतर से हारे ये भाजपाई किसी भी समझौते को तैयार नहीं हैं।
संगठन को इस बात का भी भय है कि यदि फैसला थोपा गया तो कहीं भाजपा के भीतर ही बगावत न हो जाए। खबर यह भी है कि कांग्रेस इन सीटों पर अपने मजबूत नेताओं के खोने का सदमा भूल नहीं पाई है और इस अंतर्कलह का पूरा फायदा उठाने के लिए घात लगाए बैठी है।