प्रचंड बहुमत से सत्ता तक पहुंची बीजेपी सरकार ने बद्री-केदार मंदिर समिति को भंग कर दिया है। मंदिर समिति का कार्यकाल अभी दो साल और शेष था। सरकार ने धर्मस्व मंत्री शैलेश बगोली को नई समिति के गठन तक कामकाज देखने के लिए प्रशासक नियुक्त कर दिया है।
समिति का गठन हरीश रावत सरकार ने किया था और श्रीनगर के पूर्व विधायक गणेश गोदियाल इसके अध्यक्ष थे। सरकार ने इस कार्रवाई का आधार अंग्रेजों के जमाने के 1939 के मंदिर समिति एक्ट में दी गई शक्तियों को बनाया है, हालांकि भंग की गई समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि सरकार संवैधानिक संस्थाओं के साथ छेड़छाड़ कर रही है।
इन स्थितियों के बीच, मंदिर समिति के मामले में अब दोनों पक्षों के बीच टकराव तय हो गया है। कानूनी लड़ाई के लिए फील्डिंग सजाई जाने लगी है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के जमाने में नियुक्त किए गए पदाधिकारियों को नई सरकार तेजी से हटा रही है।
तकरीबन विभागों में ऐसे पदाधिकारी हटाए जा चुके हैं। पहले दिन से ही बात की भी चर्चा थी कि कांग्रेस सरकार में गठित मंदिर समिति पर सरकार का क्या नजरिया रहेगा। अंग्रेजों के जमाने के मंदिर समिति एक्ट में अध्यक्ष और बोर्ड सदस्यों का कार्यकाल तीन साल का निर्धारित किया गया है। माना जाता है कि इससे पहले, सरकार यदि बोर्ड के किसी पदाधिकारी को हटाना चाहती है, तो उस पर गंभीर आरोप होने जरूरी हैं।