नए-नवेले पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित की उत्तराखंड उप-चुनाव में करारी मात के बाद पिलाई गई झाड़ और नसीहतों के बाद भी प्रदेश भाजपा के नेताओं ने कोई सबक नहीं लिया।
न कुनबे की अंदरूनी कलह रुकी, न ही एकजुटता बन पाई। नतीजा हार की हैट्रिक के रूप में सामने है। पिछले जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में कांग्रेस ने दो सीटें जीत पाई थी, इस बार के परिणाम बिलकुल उलट हैं। अब भाजपा दो की संख्या पर सिमट गई है।
चुनाव जीतने के लिए कुशल और ठोस प्रबंधन के बजाय भाजपाई बयानबाजी में मशगूल रहे। ऊधमसिंहनगर में पार्टी ने पहले ही हथियार डाल दिए थे।
मोर्चाबंदी में हाथ से निकली उत्तरकाशी की सीट
विगत दिवस ही प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत के आगाह करने के बावजूद अध्यक्ष पद की प्रत्याशी मधु चौहान को कम और उपाध्यक्ष पद के प्रत्याशी सुभाष शर्मा को सत्रह वोट मिलना क्रास वोटिंग की कहानी बयां कर रहा है।
उत्तरकाशी में पार्टी विधायक मालचंद और दूसरे धड़े की मोर्चाबंदी में यहां की सीट हाथ से निकल गई। टिहरी में भी बमुश्किल इज्जत बची।
कुमाऊं के कई जिलों में तो हालात और भी ज्यादा खराब दिखे। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह रही कि तीन विस सीटों के उपचुनाव में मिली पराजय के बाद भी बड़े नेताओं ने एकजुट होकर ऐसी कोई रणनीति नहीं बनाई जिससे इज्जत बचाई जा सके।
नैनीताल में मुकाबला कांटे का
भाजपा में लोकसभा चुनाव जीतकर पराये से हुए सांसद और स्थानीय गणित में उलझे विधायकों ने भी पार्टी की फजीहत की परवाह नहीं की।
भाजपा की जिला इकाइयां मूक बनकर बस बयानबाजी करती रहीं कि सरकारी मशीनरी का गलत इस्तेमाल हो रहा है। चुनाव में जिस संसाधन की आवश्यकता थी चाहकर भी प्रदेश नेतृत्व पूरा नहीं कर सका।
कुमाऊं की बात करें भाजपा यहां सबसे ज्यादा कमजोर साबित हुई। ऊधमसिंह नगर में तो भाजपा अपना उम्मीदवार भी नहीं उतार सकी और सीट एक तरह से तश्तरी में सीधे तौर पर कांग्रेस को पेश कर दी।
रोचक बात यह है कि जिले में नौ में से छह विधायक भाजपा के हैं। बताते हैं कुछ भाजपा विधायक तो कांग्रेस उम्मीदवार के लिए लामबंदी कर रहे थे। नैनीताल में मुकाबला कांटे का रहा।
यहां भी भाजपा विधायक बंसीधर भगत जिन सुमित्रा प्रसाद को कुछ समय पहले भाजपा में लाए थे वो कांग्रेस बनकर जिला पंचायत अध्यक्ष चुनी गई हैं।