भाजपा परिवर्तन यात्रा से तो कांग्रेस सतत विकास संकल्प यात्रा से अपना चुनावी अभियान शुरू कर चुकी हैं। दोनों दल एक चरण की यात्रा पूरी कर चुके हैं, लेकिन अभी तक दोनों दलों की प्रचार रणनीति एक दूसरे से उलट चल रही है।
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भाजपा ने राष्ट्रीय नेताओं को मैदान में झोंक केंद्र के सुशासन पर फोकस रख सीएम रावत को घेरा है। वहीं कांग्रेस की प्रचार की कमान हरीश रावत के हाथ दिख रही है, जबकि उनकी केंद्रीय लीडरशिप पूरी तरह से गायब रही।
जहां भाजपा के नेता सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी सरीखे राष्ट्रीय मुद्दों पर फोकस कर रही है वहीं कांग्रेस ने क्षेत्रीय एजेंडे को फोकस में रख कर केंद्र को कोसना जारी रखा है। कांग्रेस क्षेत्रीय मुद्दे से सहानुभूति बटोरने की राह पर चलती दिख रही है जबकि भाजपा मोदी सरीखी सरकार प्रदेश में देने का दम भर रही है।
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केंद्र के ‘मॉडल’ से सत्ता वापसी चाहती है भाजपा
narendra modi
- फोटो : narendra modi
प्रदेश की सत्ता पर दोबारा काबिज होने के लिए भाजपा कांग्रेस पर हमला करने से अधिक पीएम मोदी के सुशासन की बैसाखी के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश में है।
परिवर्तन यात्रा रथों पर सवार केंद्रीय लीडरशिप भले सीएम हरीश रावत को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कोस रही है, लेकिन जनता को केंद्र सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी जैसी उपलब्धियां बताकर बेहतर सरकार का विकल्प सुझा रही है। केंद्र से फंड नहीं मिलने के आरोपों पर आंकड़ों की बाजीगरी से मात देने का कार्ड भी खेला जा रहा है। भले प्रदेश में भाजपा की अब तक दो बार सरकार रह चुकी है, लेकिन उस दौर की उपलब्धियां अब चुनावी जनसभाओं में सुनाई तक नहीं दे रही।
भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव में प्रचार की जो नीति अपनाई है उसमें केवल मोदी सरकार की उपलब्धियां और हरीश रावत की नाकामियां उभर कर आ रही हैं। वर्ष 2012 में भाजपा ने पूरा दांव खंडूड़ी सरकार के कठोर फैसलों पर खेला था। लोकपाल बिल, ट्रांसफर एक्ट, सिटीजन चार्टर जैसे मुद्दों को उठाया गया। उस समय कांग्रेस ने भाजपा कार्यकाल के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया। अब प्रचार का मोर्चा पूरी तरह से केंद्रीय लीडरशिप के हाथ में दिख रहा है, जबकि प्रदेश संगठन के हिस्से भीड़ जुटाने भर का काम रह गया है।
सीएम हरीश रावत के अलावा किसी दूसरे मंत्री या विधायक को भाजपा अपने निशाने पर भी नहीं ले रही है। भाजपा मतदाताओं को यह समझाने में जुटा है कि केंद्र की योजनाएं तस्वीर बदल देंगी। इतना ही नहीं प्रदेश में भाजपा आएगी तो केंद्र से उत्तराखंड को नई योजनाओं के साथ अधिक फंड भी मिल सकेंगे। इससे ठीक उलटा कांग्रेस पूरी तरह से हरीश रावत पर केंद्रित अभियान चला रही है, जबकि कांग्रेस की केंद्रीय लीडरशिप अभी तक की सियासी सीन से ही गायब है। रावत की ओर से भी निशाना प्रदेश भाजपा नहीं बल्कि सीधे नरेंद्र मोदी पर साधा जा रहा है। भाजपा कार्यकाल के कई-घपले घोटालों को अब तक चुनाव-प्रचार में जिक्र नहीं हुआ है।
विधानसभा चुनाव के प्रचार मैदान में कांग्रेस के केंद्रीय दिग्गजों की गैरमौजूदगी सबको हैरान कर रही है। सियासी हवाओं में तमाम तरह सवाल तैर रहे हैं। क्या उत्तराखंड के लिए कांग्रेस हाईकमान फुरसत नहीं निकाल पा रहा है या उसने मुख्यमंत्री हरीश रावत पर ही सब कुछ छोड़ दिया है। ये कांग्रेस की रणनीति है या मजबूरी? इन सवालों के बीच भाजपा एक के बाद एक हेवीवेट नेता को मैदान में उतार कर कांग्रेस पर बुरी तरह से टूट पड़ी है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से लेकर मोदी मंत्रिमंडल के तमाम बड़े मंत्री भाषणों के जरिए वोटरों को यह यकीन दिलाने का जतन कर रहे हैं कि दिल्ली और देहरादून में भाजपा की सरकार के फायदे ही फायदे हैं। उनके जवाब में कांग्रेस के पास बड़े चेहरे के तौर पर फिलहाल मुख्यमंत्री हरीश रावत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय हैं। दोनों ही नेता भाजपा के राष्ट्रीय मुद्दों का जवाब क्षेत्रीय मुद्दों से देने की कोशिश कर रहे हैं।
कांग्रेस की रणनीति को लेकर कार्यकर्ताओं की पेशानी पर बल हैं। दरअसल, उन्हें कांग्रेसी दिग्गजों को अब तक मैदान में न उतारा जाना खटक रहा है। लेकिन पार्टी नेताओं के अपने तर्क हैं। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी तो केंद्रीय नेताओं को मैदान में न उतारे जाने को कांग्रेस की सुनियोजित रणनीति बता रहे हैं। सियासी जानकार भी इससे कुछ-कुछ इत्तेफाक रखते हैं।
वे इस संभावना से भी इंकार नहीं कर रहे हैं कि भाजपा के केंद्रीय दिग्गजों के समक्ष हरीश रावत को अकेला छोड़कर कांग्रेस स्थानीय लोगों की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रही है। उनकी माने तो इसे सतत विकास संकल्प यात्राओं के दौरान हो रही जनसभाओं में सीएम और पीसीसी चीफ के भाषणों से समझा जा सकता है जो पूरी तरह से क्षेत्रीय मु्ददों पर केंद्रित हैं। हरीश रावत रिवर्स पलायन, चकबंदी, इंदिरा अम्मा, खेती को सुअरों-बंदरों से हो रहे नुकसान सरीखे मुद्दों को उठाकर क्षेत्रीय एजेंडे पर चल रहे हैं।