फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

टीडीसी घपला: भाजपा और कांग्रेस दोनों के गले की फांस

Mon, 12 Jun 2017 06:46 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
uttarakhand assembly
विज्ञापन
तराई बीज विकास निगम के घपले-घोटाले के किस्से सदन में खुले, तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों को कई मौकों पर असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। इस मामले को जोर-शोर से उठाने वाली कांग्रेस पर सवाल उठे, कि पांच साल सत्ता में रहने के बावजूद उसने कार्रवाई क्यों नहीं की।
विज्ञापन


दूसरी तरफ, बीजेपी की असहजता का कारण इस मामले को उसके पूर्ववर्ती शासनकाल से डायरेक्ट कनेक्शन रहा। इन स्थितियों के बीच, पीठ ने इस मामले पर जिस तरह से बीजेपी की दलीलों को खारिज करते हुए विपक्ष को बात रखने का मौका दिया, उसने भी ट्रेजरी बेंच की परेशानी बढ़ाई। बाद में सरकार ने पूरे मसले में परीक्षण का आश्वासन देकर किसी तरह से पिंड छुड़ाया।

प्रश्नकाल निपटते ही कांग्रेस के रानीखेत विधायक करन माहरा तराई बीज विकास निगम के मामले को ले आए।  उन्होंने कहा कि बीजेपी शासनकाल में तराई बीज विकास निगम में घोटाले हुए। इसने इस संस्था की साख खराब की। इस संबंध में 2012 में गठित भाटी आयोग की रिपोर्ट को आज तक सदन मे नही रखा गया है।
विज्ञापन


उन्होंने नियम 310 में इस विषय पर चर्चा कराने की मांग की, तो सत्ता पक्ष ने इसके औचित्य पर सवाल खड़े कर दिए। संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पंत कहा कि ये मामला तात्कालिक महत्व का नही है। 2010 के इस मामले को इस नियम के तहत नही उठाया जा सकता। बाद मे स्पीकर प्रेम चंद्र अग्रवाल ने नियम 58 के तहत इसकी ग्राहृयता पर इसे सुनने की अनुमति दी, तो बीजेपी विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने व्यवस्था का सवाल उठा दिया। हालांकि पीठ ने इसे खारिज कर दिया।
विज्ञापन

सदन को भाटी आयोग की रिपोर्ट का इंतजार

harish rawat
2010 में बीजेपी सरकार के जमाने में तराई बीज विकास निगम में घपले-घोटाले का मामला सामने आया था। शिकायतें थीं कि यहां बीज खरीद में घपला हुआ है। इसके अलावा, नियुक्तियों में गोल-माल किया गया है। और तो और नियम विरूद्घ चेयरमैन की नियुक्ति की गई है।

विपक्ष का आरोप है कि इस घपले-घोटाले के बाद निगम की साख गिरी है और पूरी व्यवस्था इस कदर चरमरा गई है कि कर्मचारियों को तनख्वाह में दिक्कत पेश आ रही है। 2012 में कांग्रेस की सरकार गठित होने पर इस मामले में भाटी आयोग का गठन कर दिया गया था। भाटी आयोग ने अपनी रिपोर्ट सररकार को पांच मार्च 2013 में सौंप दी थी, मगर इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। विपक्ष के अनुसार, रिपोर्ट में दोषियों के खिलाफ मुकदमे की सिफारिश की गई है।

विपक्ष ने निगम के घपले-घोटाले के मामले को उठा तो दिया, लेकिन बाहर-भीतर की सियासत भी इसमें जुड़ी हुई रही है। नेता प्रतिपक्ष बनने के मामले में करन माहरा को इस मामले में डा इंदिरा हृदयेश का सदन में बहुत समर्थन मिलता नहीं दिखाई दिया। दूसरी तरफ, हरीश रावत के रिश्तेदार करन माहरा के इस मामले में आगे आने के भी निहितार्थ निकाले जा रहे हैं।

कहीं न कहीं कांग्रेस से बगावत करके बीजेपी में गए तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा, कृषि मंत्री डा हरक सिंह रावत की घेराबंदी का प्रयास किया गया है। सवाल उन्हीं पर ज्यादा है, कि क्यों नहीं उन्होंने एक आयोग गठित करके उसकी रिपोर्ट पर कार्रवाई नहीं की। इसके अलावा, 2010 के इस मामले में तत्कालीन कृषि मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत अब सीएम है। कांग्रेस उन्हें भी निशाने पर ले रही है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें