हर ‘चालीस कोस’ पर बोली बदल जाने की कहावत परिदों पर भी सटीक बैठती है (एक कोस = 2.25 मील)। यही नहीं एक ही प्रजाति का पक्षी अलग-अलग माहौल में अपनी जुबान भी बदलता है। जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा परिंदों की आवाज के डीकोडिंग में यह खुलासा हुआ है।
जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने अब तक 230 प्रजाति के पक्षियों की आवाज रिकार्ड की है और एक सोनोग्राम तैयार किया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक भाषा की फ्रीक्वेंसी से तैयार सोनोग्राम की डिकोडिंग से हुए खुलासे चौंकाने वाले हैं। अध्ययन में पाया गया है कि पक्षियों की बोली में ठीक वैसी ही संवेदनाएं होती हैं जो इंसानों की बोलियों में हैं।
भौगोलिक स्थिति, समय, काल के मुताबिक जिस तरह इंसानों की क्षेत्रीय बोलियां बदलती हैं उसी तरह पक्षियों की बोलियां भी अपडेट होती हैं। संस्थान का दावा है कि यह पहली बार है जब ट्रांस हिमालयन क्षेत्र के पक्षियों पर ऐसा काम हुआ है। इस क्षेत्र में पाए जाने वाले सौ पक्षियों में से 35 की आवाज रिकार्ड की गई है।
जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के विज्ञानी डॉ. अनिल कुमार कई वर्षों की मेहनत केबाद पक्षी संसार की भाषा समझ पाए हैं। अध्ययन में बताया गया कि सबसे आसान भाषा छोटा बच्चा बोलता है। इसकी ध्वनि की फ्रीक्वेंसी बहुत कम होती है जबकि मेटिंग सीजन में पक्षी सबसे जटिल भाषा बोलते हैं।