भूरा की फरारी के बाद सरकार को सड़क से विधानसभा तक किरकिरी झेलनी पड़ी। दिल्ली और पंजाब पुलिस के ज्वाइंट ऑपरेशन से हुई गिरफ्तारी ने राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
साथ ही राज्य पुलिस की वर्दी पर उसकी फरारी से लगी कालिख अब नहीं धुल पाएगी। विपक्ष के सरकार पर लगातार तीखे हमले होते रहे, लेकिन राज्य पुलिस खोजबीन को बढ़ाने के बजाए सरेंडर की मुद्रा में ज्यादा दिखी।
15 दिसंबर को हिरासत से भागे भूरा को पकड़ने में राज्य पुलिस के तमाम प्रयोग फेल साबित हुए। विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को हर फ्रंट पर घेरा। विधानसभा में कई बार भूरा की फरारी का मुद्दा उछला। सरकार सिर्फ सदन में आश्वासन देती रही, लेकिन राज्य पुलिस ने सिर्फ उसे निराश किया।
एसएसपी देहरादून अजय रौतेला की जगह पुष्पक ज्योति को लाने का प्रयोग भी असफल रहा। संसाधन विहीन एसटीएफ ने कुछ समय प्रयास किए, लेकिन वहां स्थाई मुखिया न होने का खामियाजा झेलना पड़ा। डीजीपी तक यह मान चुके थे कि भूरा को पकड़ना आसान नहीं है, जिसके चलते लंबे समय से तलाशी के लिए पुलिस अपने लगभग सभी ऑपरेशन बंद कर चुकी थी।