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वर्दी पर लगा दाग नहीं धो पाई उत्तराखंड पुलिस

Sun, 05 Apr 2015 12:51 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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भूरा की फरारी के बाद सरकार को सड़क से विधानसभा तक किरकिरी झेलनी पड़ी। दिल्ली और पंजाब पुलिस के ज्वाइंट ऑपरेशन से हुई गिरफ्तारी ने राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
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साथ ही राज्य पुलिस की वर्दी पर उसकी फरारी से लगी कालिख अब नहीं धुल पाएगी। विपक्ष के सरकार पर लगातार तीखे हमले होते रहे, लेकिन राज्य पुलिस खोजबीन को बढ़ाने के बजाए सरेंडर की मुद्रा में ज्यादा दिखी।

15 दिसंबर को हिरासत से भागे भूरा को पकड़ने में राज्य पुलिस के तमाम प्रयोग फेल साबित हुए। विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को हर फ्रंट पर घेरा। विधानसभा में कई बार भूरा की फरारी का मुद्दा उछला। सरकार सिर्फ सदन में आश्वासन देती रही, लेकिन राज्य पुलिस ने सिर्फ उसे निराश किया।
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एसएसपी देहरादून अजय रौतेला की जगह पुष्पक ज्योति को लाने का प्रयोग भी असफल रहा। संसाधन विहीन एसटीएफ ने कुछ समय प्रयास किए, लेकिन वहां स्थाई मुखिया न होने का खामियाजा झेलना पड़ा। डीजीपी तक यह मान चुके थे कि भूरा को पकड़ना आसान नहीं है, जिसके चलते लंबे समय से तलाशी के लिए पुलिस अपने लगभग सभी ऑपरेशन बंद कर चुकी थी।
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फरारी करवाने वाले भी यूपी पुलिस ने पकड़े

वहीं भूरा के हिरासत से भागने के बाद जो अधिकारी कभी दिल्ली और कभी यूपी जाकर सुर्खियों में बने रहे वह कुछ समय बाद हाथ पर हाथ धरकर बैठ गए थे। भूरा की फरारी में उसको मदद देने वाले आरोपी भी उत्तर प्रदेश पुलिस ने पकड़े।

पुलिस जब यह मान चुकी थी कि वह तमाम कोशिशें कर चुकी है, भूरा हाथ नहीं आने वाला, तो तब दिल्ली और पंजाब पुलिस ने भूरा को दबोच लिया। दूसरे राज्यों की पुलिस की कामयाबी ने न केवल उत्तराखंड पुलिस की नेटवर्किंग पर सवाल खड़ा किया है बल्कि बड़ी वारदातों पर अक्सर असफल रहने के कारणों की पोल भी खोल दी है।

नकरौंदा कांड में यूपी पुलिस ने बचाई लाज
नकरौंदा में हुई डकैती और हत्या की वारदात में विपक्ष के हाथों सरकार की जमकर किरकिरी हुई थी। नकरौंदा के आरोपियों को पकड़ने के लिए सरकार ने कई बार डेडलाइन तय की, लेकिन हाथ कुछ नहीं लगा। उस दौरान भी बिजनौर पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर राज्य पुलिस की साख बचाई।
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