नैनीताल हाईकोर्ट ने चमोली जिले के अंतर्गत थराली, देवाल और घाट ब्लाकों में रूपकुंड की तलहटी में पाए जाने वाले बुग्यालों (घास के हरे-भरे मैदान) के संरक्षण के मामले में वन विभाग को तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
एक्टिंग चीफ जस्टिस वीके बिष्ट एवं न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की संयुक्त खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।
आली बेदनी बागजी बुग्याल संरक्षण समिति जिला चमोली के अध्यक्ष दयाल सिंह पटवाल ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी।
उनका कहना था कि उत्तरी हिमालयी क्षेत्र में जिला चमोली के अंतर्गत थराली, देवाल और घाट ब्लाकों में रूपकुंड की तलहटी में बग्याल पाए जाते हैं, जो कि वर्तमान में संकट में हैं।
सिर्फ पारंपरिक चरान को ही जारी रखा जाए
याचिका में कहा गया था कि बुग्याल क्षेत्र में व्यावसायिक चरान को रोकते हुए सिर्फ पारंपरिक चरान को ही जारी रखा जाए।
इसके लिए सिर्फ भेड़ और बकरी को ही चराने की अनुमति स्थानीय लोगों को दी जाए। याचिका में कहा कि एशिया के प्रसिद्ध बेदनी बुग्याल जो कि तीन हजार से चार हजार वर्गमीटर में फैला हुआ है जिससे उनका संरक्षण किया जा सकें।
याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि वन विभाग की ओर से व्यावसायिक चरान को रोकने के लिए कोई भी नीति नहीं बनाई गई है जो बुग्यालों के संरक्षण में अत्यधिक आवश्यक है।
वन विभाग की ओर से पर्यटकों के लिए फाइबर हट्स का निर्माण सीमेंट और कंकरीट का आधार देकर अत्यधिक मात्रा में बुग्याल क्षेत्र में बनाए गए हैं, जिनको हटाया जाना चाहिए।
याचिका में कहा कि व्यावसायिक चरान से हिमालयी क्षेत्र में स्थित बुग्यालों में उगने वाली कई औषधि, वनस्पतियों को भी नुकसान पहुंच रहा है। जो कि पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक है।
बेदनी बुग्याल का है धार्मिक और पौराणिक महत्व
याचिका में यह भी कहा कि बेदनी बुग्याल का धार्मिक और पौराणिक का इसलिए भी महत्व है कि बुग्याल क्षेत्र से ही होते हुए प्रत्येक 12 वर्ष में नंदा राजजात यात्रा होती है जो कि इस वर्ष भी अगस्त माह में होनी वाली है।
एक अन्य दायर जनहित याचिका में समिति की ओर से कहा गया था कि रूपकुंड की तलहटी में स्थित ब्लाक थराली, देवाल व घाट ब्लाकों के वनों मे पाए जाने वाले पेड़ों में एक तरह का फर्न जिसे एफआरआई द्वारा ड्राइनेरिया-मालिस नाम दिया गया है।
जिसको परजीवी बेल भी कहा जाता है जो कि पेड़ों पर घास की तरह उग रही है और पेड़ों के विकास में बाधक है, जिसके कारण पेड़ सूखते जा रहे हैं।
याचिका में कहा कि इसे दूर करने व वनों को बचाने के लिए वन विभाग को निर्देशित किया जाए। दोनों याचिकाओं पर पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने तीन सप्ताह के भीतर वन विभाग को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।