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नाम को किया सार्थक, पेड़ों से 100 युवाओं की तंग जिंदगी की 'खुशहाल'

Fri, 15 Jul 2016 08:43 AM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
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khushhal singh negi
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पेड़ों की अहमियत सिर्फ वातावरण में उत्सर्जित कार्बन डाई आक्साइड खपाने तक ही नहीं है, बल्कि ये रोजगार का बेहतरीन जरिया भी हैं।
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पेड़ों को अपनाने पर जिंदगी की दिशा और दशा दोनों बदल सकती हैं। ऐसी ही एक नजीर उत्तरकाशी के सीमांत गांव मुखवा (गंगोत्री) के खुशहाल सिंह नेगी ने प्रस्तुत की है।

11 पेड़ों की बदौलत नेगी को मिली कामयाबी ने क्षेत्र के 100 युवाओं की तंगदस्ती की दास्तान सक्सेस स्टोरी में तब्दील कर दी। इन गांवों से अब पलायन रुक गया और खुशहाली है।
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यह स्टोरी मुखवा गांव की है। वर्ष 1962 के युद्ध के बाद तिब्बत सीमा सील होने के साथ गांव के कुंवर सिंह नेगी का कारोबार ठप हो गया। आठ बेटियों और एक बेटे वाला परिवार आर्थिक तंगी से घिर गया। कुंवर सिंह के बेटे खुशहाल ने राजनीति शास्त्र से एमए कर लिया था।

बहनों की शादी और घर चलाने के लिए गांव से बाहर निकलना जरूरी था। खुशहाल ने देहरादून, दिल्ली या किसी दूसरे प्रांत में जाकर नौकरी ढूंढने का इरादा किया। छह साल पहले जब खुशहाल गांव छोड़ने का मन बना रहे थे तभी उनकी भेंट उत्तराखंड और यूपी में हरेला को अभियान का रूप देेने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रांत प्रचारक डॉ. हरीश रौतेला हुई।

डॉ. हरीश ने खुशहाल की पूरी बात सुनी और उन्हें 11 सेब के पौधे भेंट किए। इन पौधों से रोजगार शुरू करने के लिए कहा। इन पौधों के जड़ पकड़ते ही खुशहाल की इच्छा शक्ति भी बलवती हुई। हिमाचल प्रदेश से सेब के पौधे ले आए, इन्हें रोपा। इस अरसे में अब उनके पास सेब के तीन सौ पेड़ हैं।
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100 नए पौधे भी लगाए हैं। खुशहाल ने बताया कि पेड़ नए हैं अभी साल में छह लाख आमदनी है। पांच-छह साल में 11 लाख हो जाएगी। डॉ. हरीश से मिली सीख उन्होंने आठ गांवों के सौ लोगों को दी। इस पर अमल से सभी के परिवार खुशहाल हैं और इन गांवों से पलायन रुक गया है। उनका कहना है कि हरेला पर्व पर सारे लोग इस सीख को अपनाएं।
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