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आंखों से छिनी रोशनी पर हौसलों से भरी उड़ान, पढ़िए इस बहादुर बेटी की दिल छू लेने वाली कहानी

Thu, 07 Dec 2017 07:29 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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supriya - फोटो : amar ujala
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बचपन में ही आंखों की रोशनी खो चुकीं सुप्रिया ने दुश्वारियों का इतना डटकर सामना किया कि खुद को कम आंकने वाले दिव्यांगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गईं।
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उत्तराखंड ग्रामीण बैंक में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत दिव्यांग सुप्रिया को हालही में समाज कल्याण मंत्री यशपाल आर्य ने एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित किया है। इप्टा समेत कई संस्थाओं की ओर से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है।
 
नौ साल की उम्र में यूपी के सीतापुर निवासी सुप्रिया की आंखों की रोशनी कम होने लगी और 16 साल की उम्र में उन्हें दिखना बंद हो गया। कई शहरों के कई डॉक्टरों को दिखाया लेकिन फायदा नहीं हुआ।
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बेटी को परेशानी न हो, यह सोचकर माता-पिता ने जब उनका स्कूल जाना बंद करवा दिया, तो वह खूब झगड़ीं और किसी तरह दसवीं की परीक्षा पास की। लेकिन फिर ऐसा विपरीत समय आया, जब आंखों की रोशनी बिल्कुल चली गई। परिजनों, नाते-रिश्तेदारों समेत आस-पड़ोस के लोगों ने उन्हें दया भरी नजरों से देखना शुरू कर दिया, साथ ही यह भी मान लिया कि वो अब कुछ नहीं कर पाएंगी।
 
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‘समाज क्या कहता है, मत करो परवाह’

- फोटो : demo
फिर एक दिन खुद को साबित करने के लिए संघर्ष कर रहीं सुप्रिया को राह मिल गई। नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर दी विजुअली हैंडीकैप्ड (एनआईवीएस) के प्रिंसिपल रामलखन वर्मा ने सुप्रिया से बात की और एनआईवीएस आने के लिए कहा।

सुप्रिया के घरवालों ने उन्हें जाने की इजाजत नहीं दी, लेकिन वह फिर भी लड़-झगड़ कर देहरादून आ गईं। यहां इंस्टीट्यूट में उन्होंने तीन महीने का प्राथमिक प्रशिक्षण लिया और इसके बाद 11वीं और 12वीं की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की। साथ ही एक साल का कंप्यूटर कोर्स भी किया। वर्ष 2015 में उन्होंने डॉक्टर बनने की चाह में जेपनीज मेडिकल कोर्स भी किया और साथ ही ग्रेजुएशन भी पूरी की।

 सुप्रिया की मेहनत रंग लाई। 2017 में सुप्रिया का पहले ही प्रयास में रुद्रपुर के उत्तराखंड ग्रामीण बैंक में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर चयन हो गया। एक जून 2017 को सुप्रिया ने ज्वाइनिंग दी। सुप्रिया अपनी कामयाबी का श्रेय एनवीएच की अनुराधा मोहित डालमिया और अपने गुरु रामलखन वर्मा, डॉ.सुखविंदर सिंह खेरा और विकास मिश्रा को देती हैं।

‘समाज क्या कहता है, मत करो परवाह’
सुप्रिया कहती हैं कि मुझे लगा था मेरा कोई साथ देने वाला नहीं है, कैसे आगे बढ़ूंगी। परिस्थितियां बेहद कठिन थीं, पर मैंने महसूस किया कि जब मैंने विरोध दरकिनार कर एक कदम आगे बढ़ाया तो मेरे साथ देने के लिए कई लोग आगे आ गए।

सुप्रिया कहती हैं कि इंसान को सबसे पहले अपनी मदद खुद करनी चाहिए। सामाजित चुनौतियों और बंदिशों को तोड़कर आगे बढ़ना चाहिए। हमेशा ईमानदारी से पहल करनी चाहिए, समाज क्या कहता है, इसकी परवाह मत करो।
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