नेपाल बार्डर पर एसएसबी ने तेज की कांबिंग
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उत्तराखंड वन विभाग के पास कई कंटीली प्रजातियां (झाड़ियां और पेड़) हैं, जिनको पार करना बेहद मुश्किल होता है। वन अनुसंधान ने डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ बायो एनर्जी रिसर्च (डिबेर) को कई प्रजातियां सौंपी हैं। संभावना है कि इन प्रजातियों को सीमा पर बायो फेन्सिंग के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
वन अनुसंधान ने डिबेर को जो प्रजातियां सौंपी हैं, उनमें झाड़ी, मध्यम पेड़ और बड़े पेड़ हैं। वन अनुसंधान नर्सरी के प्रभारी मदन बिष्ट कहते हैं कि डिबेर ने कंटीली प्रजातियों के बारे में जानकारी और पौधे मांगे थे, वह सौंप दिए हैं। इसका प्रयोग कहां और किस लिए करेंगे, यह जानकारी सुरक्षा का हवाला देते हुए नहीं दी गई है।
वन अनुसंधान की तरफ से हिसालु, किल्मोड़ा, दमर और घिंघारू की कटीली झाड़ीनुमा प्रजाति दी गई हैं, ये जमीन से सटी होती हैं। इनको पार करना मुश्किल होता है। इसके अलावा पचनाला, शमी, कुमठा जैसे मध्यम श्रेणी के कटीले पेड़ और कैथ, बेर के बड़े पेड़ वाली प्रजातियों को भी सौंपा गया है।
एसएसबी सतर्क
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अगर इन प्रजातियों को त्रिस्तरीय तरीके से खेत या कहीं पर इस्तेमाल किया जाए, तो यह जैविक तारबाड़ की तरह (बायो फेन्सिंग) बेहतर ढंग से कार्य कर सकते हैं। जानवर और इंसान दोनों के लिए इसे पार करना मुश्किल होता है। पहाड़ में जंगली सूअर आदि फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, ऐसे में इन प्रजातियों को भीड़े (मेड़) पर इस्तेमाल कर सकते हैं। बताया जा रहा है कि ये कंटीली प्रजातियां भूमि संरक्षण में भी मददगार होंगी।
कंटीली प्रजातियों का ट्रायल करना चाहिए, यह बेहतर कदम हो सकता है। पर कौन प्रजाति कहां पर तैयार हो सकती है, जहां पर इन्हें लगाया जाए उस स्थान पर घनी झाड़ी (कोई छिप सकता है) न हो, इन सभी बातों का ध्यान रखना होगा।
- बीडी कांडपाल, पूर्व सैन्य अधिकारी
कैक्टस बायो फेन्सिंग के तौर पर काम कर सकता है। किसानों को खेतों में कैक्टस लगाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। यह पर्यावरण, भूमि संरक्षण की दृष्टि से भी हितकारी है।
- डा. चंद्रशेखर सनवाल, डीएफओ हल्द्वानी वन प्रभाग