पीसीएस अफसरों को बैकडेट में प्रमोशन देने के नियम-कानून की पड़ताल शुरू हो गई है। कार्मिक विभाग दिन भर सेवा नियमावली और शासनादेशों में इससे संबंधित नियम को खंगालता रहा, मगर सफलता नहीं मिली।
विभाग में कार्यरत पुराने अफसरों से भी इस बाबत परामर्श किया गया, लेकिन उन्होंने भी बैकडेट में प्रमोशन देने संबंधी किसी नियम या शासनादेश की जानकारी होने से इनकार कर दिया। खबर यह है कि यह स्थिति देखते हुए परीक्षण रिपोर्ट में यह लिखकर देने की तैयारी है कि प्रदेश के हित में और प्रशासनिक दृष्टि से शासन ने बैकडेट में प्रमोशन करने का फैसला लिया है।
बीती 2 अगस्त को 30 पीसीएस अफसरों के प्रमोशन संबंधी आदेश कार्मिक विभाग से जारी किया गया। इस आदेश में सभी अधिकारियों को वर्ष 2013 से प्रमोशन देने की बात कही गई। इस नियमविरुद्ध कार्रवाई की खबर अमर उजाला ने प्रमुखता से प्रकाशित की, जिससे अफसरों में खलबली मच गई।
पीसीएस अफसरों ने यह तर्क दिया कि वे वर्ष 2013 में शिथिलीकरण का लाभ लेते हुए प्रमोशन के लिए एलिजिबल हो गए थे, मगर प्रमोटी अफसरों से चल रहे कानूनी विवाद के चलते प्रमोशन नहीं हो पाया। दोनों पक्षों में सुलह होने के बाद अब यह प्रमोशन बैकडेट से दिया जा रहा है। बहरहाल उनके दावे से इत्तेफाक न रखते हुए मुख्य सचिव ने प्रमोशन के आधारों का परीक्षण करने के आदेश दिए। यह भी आदेश दिया गया कि परीक्षण होने तक प्रमोशन संबंधी आदेश का कार्यन्वयन नहीं किया जाए। इधर, कार्मिक विभाग ने परीक्षण की कार्रवाई शुरू की।
सूत्रों के मुताबिक बुधवार को दिन भर उस शासनादेश की प्रति तलाशी गई, जिसमें बैकडेट से प्रोन्नति दिए जाने की बात दर्ज है। मगर ऐसा कोई आदेश मिला ही नहीं। 23 जून 2003 को राज्याधीन सेवाओं में विभिन्न पदों पर चयन और प्रमोशन संबंधी सात पेज के शासनादेश (संख्या- 1801/कार्मिक-2/2002) में भी इस बिंदु की तलाश की गई, मगर उसमें भी बैकडेट से प्रोन्नति दिए जाने संबंधी प्रावधान नहीं मिला। वहीं कार्मिक विभाग के जानकार अधिकारियों ने भी बैकडेट में तरक्की देने को लिखापढ़ी में होने की बात से इनकार कर दिया।
उत्तराखंड जुगाड़ स्टेट बन गया है। हरीश रावत खुद भी इस बात को स्वीकार करते नजर आ रहे हैं कि उनके पास नियमविरुद्ध प्रमोशन की फाइलें आती रहती हैं। गुड गवर्नेंस का हाल इसी से समझा जा सकता है कि यहां बैकडेट में अफसरों को प्रमोशन दे दिया जाता है, जिसका कोई प्रावधान ही नहीं है। हैरानी की बात यह भी है कि जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर खामोशी साधे हैं। यह राज्य बेहद संघर्ष के बाद बना है। ऐसे फैसले उत्तराखंड को गर्त में ले जाने का काम कर रहे हैं। यदि यह आदेश जल्द से जल्द वापस न हुआ तो उत्तराखंड के हित में इस मामले को कोर्ट ले जाऊंगा।
- रवींद्र जुगरान, पूर्व दर्जाधारी