बाबा रामदेव ने बताया कि देश-विदेश में कोई उद्योग चलाने वाला अपनी पत्नी, पुत्र या पुत्री को विरासत सौंपता है। तब यह नहीं देखा जाता कि वह उस परंपरा को निर्वाह करने के योग्य है या नहीं, लेकिन संन्यास जगत में ऐसा नही होता।
विशेषरुप से पतंजलि योगपीठ ऋषि परंपरा के अनुसार आचरण करेगी। देशभर में घूम-घूम कर एक हजार योग्य साधकों का चयन कर उनमें से किसी एक को पंतजलि की विशाल परंपरा का वाहक बनाया जाएगा।
इस दीक्षा समारोह में वैदिक यज्ञ कुंडों के माध्यम से नवसंन्यासियों को दीक्षित किया जा रहा है। यहां से निकले साधक रामनवमी के दिन देश के अनेक भागों में योग स्थापना के लिए भेजे जाएंगे। एक ऐसी परंपरा ऋषिकेंद्र से प्रारंभ हो रही है, जो इस रुप में आज तक कभी सामने नहीं आई।
हालांकि अखाड़ों में भी प्रत्येक कुंभ पर दीक्षा समारोह आयोजित कर हजारों संन्यासियों को दीक्षा दी जाती है, लेकिन उनमें से कोई अखाड़ा परंपरा का उत्तराधिकारी नहीं बनता। अखाड़ों में उत्तराधिकार चयन के बजाय उत्तराधिकार मनोनयन की परंपरा है। इसके विपरीत बाबा रामदेव ने संस्कार दीक्षा के माध्यम से उत्तराधिकार चयन की एक नई परंपरा को जन्म दिया है।