फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

उत्तराखंडः आखिर क्यों, सदन में क्यों रो पड़ी 'विधायिका'?

Sun, 27 Dec 2015 05:48 PM IST
रेनू सकलानी/ अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
विज्ञापन
देहरादून में अपनी आप बीती बताते-बताते सदन में बाल विधायिका रो पड़ी। बाल विधानसभा सदन में 12वीं कक्षा की बाल विधायक अधिकता ने लड़कियों की सामाजिक सुरक्षा के उस मर्म को छुआ जिसके लिए सरकारें बड़े-बड़े वादे और दावे करती रहती हैं।
विज्ञापन


नैनीताल रामनगर से विधानसभा में पहुंची विधायक ने सदन में अपने संघर्ष की कहानी रखी तो सुनकर सब सन्न रह गए। लड़कियों से छेड़छाड़ के विरोध की मुहिम में उसे अपने स्कूल के प्रबंधन से लेकर तमाम आला अफसरों के हाथों अपमानित होना पड़ा।

जिस देश में निर्भया कांड जैसी दर्दनाक घटना हो चुकी है उसी देश के छोटे से कस्बे में जब एक स्कूल की छात्रा ने बसों में लड़कियों से होने वाली छेड़छाड़ के खिलाफ मुहिम चलाई तो सब उसके दुश्मन बन गए। उसे सबसे बड़ी ठेस स्कूल की महिला प्रधानाचार्य के व्यवहार से पहुंची, जिन्होंने साथ देने के बजाय जब अधिकता ने लड़कियों की सुरक्षा के लिए रैली निकाली तो उसे बीच सड़क पर सरेआम पीटा।
विज्ञापन


रविवार को राजपुर रोड स्थित एक होटल में आयोजित बाल विधानसभा का सदन बैठा तो उसमें बाल विधायकों ने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर कई मुद्दों को उठाया। लेकिन, रामनगर से चुनी गई अधिकता बबली रौतेला का संबोधन सबसे अलग था। उसने लड़कियों से होने वाले छेड़छाड़ के विरोध को कुछ समय पहले अपने संघर्ष की कहानी से जोड़ा, जिसका हर शब्द समाज के ठेकेदार कहे जाने वालों पर प्रहार था।

रौतेला ने बताया कि बाल विधायिका होने के नाते मैंने क्षेत्र में लड़कियों के साथ हो रहे व्यवहार पर आवाज उठाई तो मामले को गंभीरता से लेने के  बजाय मुझे मानसिक प्रताड़ना दी जा रही है। हैरत की बात यह है कि इन हालात में जिन्हें हमारे साथ खड़ा होना चाहिए था, वही विरोधी बन गए।

उसने कहा कि गुरु, शिष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, लेकिन गोमती पूरन प्रसाद आर्य कन्या इंटर कॉलेज रामनगर की प्रधानाचार्य के बारे में सुनने के बाद हर बच्चे को गुरु शब्द से नफरत हो जाएगी।
विज्ञापन

रोज होती ‌थी लोकल बसों में लड़कियों के साथ छेड़छाड़

स्कूल की लड़कियों के साथ हो रहे बर्ताव और उनकी समस्या के बारे में बताने के बाद प्रधानाचार्य ने कार्रवाई करने के बजाय लड़कियों के लिए अभद्र शब्दों का प्रयोग किया। घर से स्कूल की दूरी आठ से 10 किमी होने के कारण लोकल बसों की देरी की वजह से कभी-कभी बच्चे स्कूल देर से पहुंचते थे।

रोज लोकल बसों में लड़कियों के साथ छेड़छाड़ होती। यह बात अधिकता ने जब प्रधानाचार्य को बताई तो समाधान करने के बजाय प्रधानाचार्य ने लड़कियों को बुरी तरह से डांटा। सुनवाई नहीं होने पर अधिकता ने स्कूल की अध्यापिका से (प्रधानाचार्य के अवकाश पर होने से) रैली निकालने की स्वीकृति ली।

70 लड़कियां जब सड़क पर रैली निकाल रही थीं तो अचानक स्कूल की प्रधानाचार्य रैली में पहुंचकर सड़क पर सारी लड़कियों को मारना पीटना शुरू कर दिया। स्कूल में लाकर भी उनकी पिटाई की गई। अधिकता से साथ जो क्रूर व्यवहार किया गया उसे देख स्कूल की हर लड़की के मन में आवाज नहीं उठाने का डर बैठ गया।

हालांकि, अधिकता के इरादे बुलंद हैं, मगर उसे लोगों का सहयोग नहीं मिल रहा है। अधिकता अब इस आस में है कि रविवार को अपनी पीड़ा को बाल विधानसभा में मुख्यातिथि बनकर पहुंच रहे विधानसभा अध्यक्ष गोविंद कुंजवाल को सुना सकें।

जिलाधिकारी-शिक्षाधिकारी भी खामोश
अधिकता ने इस मामले पर जिलाधिकारी को पत्र भेजा। उन्होंने मामले का संज्ञान तो लिया, लेकिन प्रधानाचार्य के खिलाफ कार्रवाई कोई नहीं की। पुलिस क्षेत्राधिकारी, मुख्य शिक्षाधिकारी सभी से समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन सभी खामोश रहे।

पुरस्कार पर सवाल?
अधिकता ने सदन में यह सवाल भी उठाया कि जिस प्रधानाचार्या ने लड़कियों की समस्या को उठाने के लिए उसे प्रताड़ित किया और उसकी मदद नहीं की उसी को हाल ही में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उसने पूछा कि ऐसा कैसे हो सकता है?
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें