उत्तराखंड के महाविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्तियों में आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन मिल नहीं रहा है। टीचरों को पहले संविदा पर रखा फिर नियमित किया, लेकिन आरक्षण कोटे के पदों को नहीं भरा गया। राज्याधीन सभी सेवाओं में रिजर्वेशन के बावजूद संविदा शिक्षकों की नियमित नियुक्तियों में नियमों को ताक पर रखा गया है।
प्रदेश के महाविद्यालयों में इक्का दुक्का नहीं, बल्कि कई बार संविदा पर टीचरों की नियुक्ति की गई। जिन्हें बाद में नियमित किया गया, लेकिन विभिन्न महाविद्यालयों में की गई नियुक्तियों के दौरान न तो संविदा न ही नियमित नियुक्ति में आरक्षण कोटे के पदों का ध्यान रखा गया।
विभागीय सूत्रों के मुताबिक पूर्व में हुई संविदा टीचरों की नियुक्तियों में कोटे के अलग से पद ही नहीं रखे गए। जो टीचर मिले बाद में उन्हें ही नियमित कर दिया गया। प्रदेश के विभिन्न राजकीय महाविद्यालयों में तैनात वर्ष 2003 के तदर्थ एवं अंशकालिक वर्ष 2006 एवं 2008 के 120 संविदा शिक्षकों को 18 जुलाई 2016 को असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति दी गई, लेकिन इसमें एससी, एसटी और ओबीसी के पदों के अभ्यर्थी दो से तीन फीसदी ही नियमित हुए हैं।
इसके अलावा 30 अगस्त 2016 को राजकीय महाविद्यालयों में तैनात 50 विभिन्न विषयों के संविदा शिक्षकों को एवं इसी वर्ष एक अन्य विज्ञप्ति जारी कर 46 संविदा शिक्षकों को असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियमित किया गया, लेकिन राज्याधीन सेवाओं, शिक्षण संस्थाओं एवं सार्वजनिक उद्यमों में अनुसूचित जाति के लिए 19, जनजाति के लिए चार और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 14 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद नियमित नियुक्ति में गिनती के अभ्यर्थी हैं।
आरक्षित पदों पर अभ्यर्थियों के न मिलने से भी समस्या बनी है, बैक लॉग के पदों को भरा जाएगा। पूर्व में हुई नियुक्तियों में सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों की जितना अधिक नियुक्ति हुई है, भविष्य में होने वाली नियुक्ति में बैक लॉग के पद भरने से वह नियुक्तियां कम हो जाएंगी।
- डॉ. बीसी मलकानी, उच्च शिक्षा निदेशक