बता दें कि प्लूटो के वायुमंडल में मीथेन की मामूली मात्रा के साथ नाइट्रोजन की अधिकता है और यह एक गैसीय पिंड है। इसका आकार सूर्य के निकट आने और इससे दूर जाने पर बदलता रहता है। इस कारण विभिन्न स्थानों पर इसका आकार अब तक सटीकता के साथ नहीं नापा जा सका है।
ऐसे में यह अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है कि इस घटना के दौरान तारे के प्रकाश में आई कमी से उस स्थान विशेष पर प्लूटो के आकार के निर्धारण में सफलता मिल सकेगी। एरीज के वैज्ञानिक शशि भूषण पांडे ने बताया कि प्लूटो के अध्ययन के लिए वैश्विक स्तर पर एरीज सहित विभिन्न महत्वपूर्ण एजेंसियों को मिलाकर एक समूह बनाया है। इसके माध्यम से इसका प्रेक्षण किया जाता है। इस बार यह अध्ययन देवस्थल और हैले में 136 सेकंड की अवधि के लिए किया गया।
भारत के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने यह अध्ययन किया, जिसमें प्रो. एनएम अशोक और प्रो. ब्रूनो सिसिली (लकी स्टार प्रोजेक्ट, ऑब्जर्वेटरी पेरिस) का सहयोग रहा। एरीज की ओर से डॉ. सौरभ और आईआईए के बीसी भट्ट ने देवस्थल और हैले बेंगलुरू में इन प्रेक्षणों का नेतृत्व किया। हालांकि घने बादल होने के कारण हैले में समुचित प्रेक्षण नहीं हो पाया।
नेपच्यून ग्रह के वातावरण के परे स्थित कुइपर बेल्ट में स्थित प्लूटो की खोज 1930 में क्लाइड टाईबाग ने की थी। तब इस बेल्ट में खोजा गया यह पहला और विशाल पिंड था। इस आधार पर इसे नौवें ग्रह की मान्यता दी गई थी लेकिन बाद में इस बेल्ट में ईरिस और अन्य पिंडों की खोज के बाद वैज्ञानिकों में इसके ग्रह के दर्जे को लेकर विवाद पैदा हो गया।
2005 में इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन ने इसके ग्रह के दर्जे की मान्यता समाप्त कर दी और इसे ड्वार्फ प्लेनेट (बौने ग्रह) की संज्ञा दी गई। हालांकि, अभी भी नासा के वरिष्ठ वैज्ञानिकों समेत तमाम खगोल वैज्ञानिक इसे ग्रह के रूप में मान्यता के पक्षधर हैं।