जहां से असल में विज्ञान शुरू होता है, वहां बच्चे कमजोर रह जाते हैं। प्राइमरी, जूनियर स्तर पर जहां बच्चों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित होना चाहिए वहां बच्चे केवल रट रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है उनका परिवेश। जहां सभी हिंदी भाषा में ही बात करते हैं। बच्चे खुद भी हिंदी भाषा में ही सहज हैं, लेकिन अंग्रेजी भाषा उन पर इस कदर लाद दी गई है कि अब वह विज्ञान को पढ़ तो रहे हैं, लेकिन समझ नहीं रहे। अंग्रेजी पढ़नी चाहिए, लेकिन जो विषय की समझ है वो हिंदी में दी जानी चाहिए। हमारे पास आज बीएससी तक हिंदी माध्यम है। हालांकि एमएससी में यह अभी मुश्किल है। भाषा के कारण हम विज्ञान से भी दूर रहे है। यदि हम चाहते है कि भविष्य में अच्छे वैज्ञानिक हमारे देश में निकले तो विज्ञान को हिंदी में पढ़ाया जाना जरूरी है।
- डॉ. सरला सकलानी, विभागाध्यक्ष गढ़वाल विवि फार्मेसी विभाग
विज्ञान समझाना है तो हिंदी को जोड़ा जाए विज्ञान से
कक्षा पांच के बाद जब बच्चे कक्षा छह में हमारे पास आते हैं, तो हम उन्हें अंग्रेजी में पढ़ाते हैं। हम पढ़ा तो रहे हैं, लेकिन बच्चा समझ ही नहीं पाता है। वो परेशान होने लगता है। मैंने ये महसूस किया कि वह हिंदी में आसानी से समझ जाते है। उन्हें सब याद रहता है। इसलिए अंग्रेजी उन्हें जबरदस्ती पढ़ाने का कोई फायदा नहीं। वो विषय को समझ ही नहीं पाते। विज्ञान एक विषय है और हिंदी एक भाषा। हमें बच्चों को विज्ञान समझाना है और हिंदी भाषा जोड़ती है। तो अगर बच्चों को विज्ञान से जोड़ना है तो विज्ञान को हिंदी से जोड़ना जरूरी है। अन्यथा बच्चे विज्ञान को कभी समझ ही नहीं पाएंगे।
- भावना नैथानी, शिक्षिका, राजकीय कन्या इंटर कॉलेज राजपुर
हिंदी माध्यम के बच्चे कम योग्य नहीं
हिंदी माध्यम के बच्चे कम योग्य नहीं होते हैं, लेकिन केवल भाषा के कारण वह दबे रह जाते हैं। हिंदी माध्यम के बच्चों में योग्यता होने के बावजूद अंग्रेजी माध्यम के बच्चों को ज्यादा बढ़ावा दिया जाता है। उन्हें अधिक काबिल समझा जाता है। केवल भाषा के कारण भेदभाव बच्चों के आत्मविश्वास को कमजोर करता है। इसलिए अध्यापकों की भूमिका यहां सबसे अहम हो जाती है। शिक्षकों की बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि केवल भाषा के कारण योग्य बच्चा पीछे न रह जाए। भाषा बच्चे की योग्यता तय नहीं कर सकती है।
- अनामिका ओझा, शिक्षिका, माइक्रोबॉयोलॉजी विभाग, उत्तरांचल पीजी कॉलेज ऑफ बायोमेडिकल साइंसेज एंड हॉस्पिटल