पढ़ाई पूरी करने बाद वह लौट आई। जिस गांव में वह खेली, अपने बचपन में कई साल बिताए, लंबे समय बाद जब उस गांव में लौटी तो गांव की तस्वीर ही कुछ और थी। गांव में केवल सात लोगों को देखा। जबकि कभी यहां लगभग 50 परिवार रहते थे।
अपने गांव की बदली तस्वीर ने सृष्टि को जो पीड़ा पहुंचाई, वहीं उन्होंने अपनी डॉक्यूमेंट्री ‘एक था गांव’ के जरिए दिखाई है। एक घंटे की यह डॉक्यूमेंट्री जल्द ही लोगों के सामने आएगी। डॉक्यूमेंट्री में खासतौर गांव में अकेले रह रही 80 साल की वृद्ध महिला व 19 साल की युवती को फोकस किया गया है।
80 साल की ऐसी वृद्ध महिला, जिसका बच्चे शहर में ही बस गए है, लेकिन वह अपने गांव को छोड़कर नहीं जाना चाहती। वहीं एक 19 साल की युवति जो कुछ करना चाहती है, लेकिन गांव में संसाधन नहीं होने के कारण वह घुट रही है।
दूसरी ओर शहर में बसे परिवार गांव को याद तो करते है, लेकिन अपनी मजबूरी के चलते वह लौट नहीं सकते। गांव छोड़ते और लौटने के बारे में सोचते वक्त भी वह कश्मश में होते है। फिल्म सितंबर-अक्तूबर में रिलीज होगी।
सृष्टि बताती है कि पहाड़ महिलाओं से ही बचा है। गांव में महिलाएं ही अकेले रह रही हैं। बतौर सृष्टि यह स्थिति केवल एक गांव के नहीं बल्कि उत्तराखंड के हर गांव में है। गांव में पुरुषों की तुलना में महिलाएं ही अधिक मिलेंगी।
फिल्म फेस्टिवल और उत्तराखंड के लोगों को दिखाएंगी फिल्म
सृष्टि ने बताया वह और उनकी टीम यह फिल्म सबसे उत्तराखंड के लोगों और फिल्म फेस्टिवल में दिखाएंगी। कहा कि पलायन की पीड़ा को हम सभी समझते है और इनके कारणों से भी हम सभी वाकिफ है, लेकिन अपने स्तर पर हम सभी को प्रयास करने होंगे। सृष्टि का कहना है कि ये कोई बॉलीवुड की कहानी नहीं है, ये रियालिटी है। हम सब जूझ रह पलायन की समस्या से।