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सोशल मीडिया पर उगली विधायकों के खिलाफ आग, इस मुद्दे पर फूटा लोगों का गुस्सा

Sat, 28 Jul 2018 05:01 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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सोशल मीडिया पर लोगों ने विधायकों को जमकर खरी खोटी सुनाई। 

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आपदा प्रभावितों के पुनर्वास के मामले में चुप रहने पर स्थानीय लोगों ने सोशल मीडिया पर पहाड़ी विधायकों के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा दिखाया है। लोगों ने पहाड़ के विधायकों पर जनता की आवाज न उठाने का आरोप लगाया है।

लोगों का साफ कहना है कि मलिन बस्तियों के लिए अध्यादेश लाने का वह विरोध नहीं कर रहे हैं, लेकिन ऐसा सरकार पहाड़ के लोगों के लिए क्यों नहीं सोचती।  क्यों पहाड़ में शिक्षा, स्वरोजगार, स्वास्थ्य, पुल व सड़क निर्माण के लिए ऐसी तत्परता दिखाती। फेसबुक और व्हाट्सएप पर आई ऐसी चुनिंदा प्रतिक्रियाओं को हम प्रकाशित कर रहे हैं। 
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फेसबुक से...
मैदान की मुखालफत करने का हमारा कोई मकसद नहीं। न मैदानी मूल के उत्तराखंडियों का विरोध, पर जिस सूबे का गठन ही सिर्फ और सिर्फ पहाड़ की उपेक्षा के चलते हुआ हो, उसमें यह भी तो नहीं चलेगा। 2025-26 में फिर परिसीमन होना है। जब आज चार के सामने 35 नहीं टिक पा रहे, तब क्या होगा।
-अजय रावत

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फेसबुक पर लोगों की प्रतिक्रिया.

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जिनके सीने में धड़कता है उत्तराखंड, वो तो कल रात भूखे सोये होंगे। उपवास रखा होगा उन सबने, अपने नेताओं के मौन पर। न जाने क्यों सब्र के बांध तोड़ने की कोशिश हो रही है। देखते हैं, कब तक कटे नाक को छुपाकर वाहवाही लेते हैं।
-महावीर सिंह जगवाण

ऐसे ही चार वर्ष 2000 में भी भारी थे और 2050 में भी भारी रहेंगे। पिछलग्गू कभी नायक बन सकते हैं क्या? 
-राकेश रतूड़ी

गैरसैंण में भी अब जमीन की खरीद फरोख्त होने जा रही है। उसके खरीदार भी बैठे हैं। स्मार्ट सिटी की तरह डेवलप किया जाएगा। किसके लिए? जगजाहिर है...
-दिनेश कंडवाल

अतिक्रमण हटाओ अभियान के नाम पर जिन लोगों के भवन तोड़ दिए गए हैं, उन्हें भी लामबंद होकर आना चाहिए। जिन लोगों के भवन तोड़ दिए गए, उनके मर्म को भी समझा जाना चाहिए।
-अखिलेश डिमरी

ये 35 एमएलए भी केवल चुनाव लड़ने पहाड़ में आते होंगे। इनकी पत्नी और बच्चे देहरादून में रहते होंगे। इसलिए इन्हें क्या फर्क पड़ता है। जनता ही खराब है पहाड़ की, जो ऐसे लोगों को चुनती है।
-राजेश बहुगुणा
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व्हाट्सएप पर लोगों की प्रतिक्रिया

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मलिन बस्तियों में रहने वाले लोग वहां अपने आप बस रहे हैं या उन्हें पैसे लेकर बसाया जा रहा है। उनकी क्या पृष्ठभूमि है। वो किस तरह के व्यवसाय से जुड़े हैं। 
-देवेंदर सिंह पटवाल

सरकार के विशेषज्ञों की टीम ने करीब चार सौ गांवों में खतरों की पुष्टि करते हुए उन्हें असुरक्षित माना है। तत्काल एक दिन की भी देरी किए बिना सुरक्षित स्थानों पर विस्थापन और पुनर्वास करने के सुझाव दिए। लेकिन कुछ नहीं हुआ। पहाड़ के विधायकों से कुछ उम्मीद करना बेईमानी है। 
-प्रदीप सती

पैंतीस मुर्दे, चार कंधे, धन्य राजनीति के फंदे।
-संजीव नेगी
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