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श्री मुरारीलाल माहेश्वरी वाद-विवाद प्रतियोगिता: एक देश एक चुनाव पर छात्र-छात्राओं ने रखे विचार

Sat, 31 Aug 2019 09:50 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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वाद-विवाद प्रतियोगिता - फोटो : अमर उजाला
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अमर उजाला की ओर से आयोजित श्री मुरारीलाल माहेश्वरी मंडल स्तरीय वाद-विवाद प्रतियोगिता में शहर के विभिन्न शिक्षण संस्थानों के छात्र-छात्राओं ने ‘एक देश, एक चुनाव’ प्रणाली पर अपने-अपने विचार रखे। देश में यदि ‘एक चुनाव’ प्रणाली लागू होती है तो यह एक बड़ा बदलाव होगा।

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क्या देश के हालात इन बदलावों के लिए तैयार हैं? होती है तो पैसा बचेगा, लेकिन क्या इसका सदुपयोग होगा या दुरुपयोग? संघीय ढांचे पर तो असर नहीं होगा? इसके लाभ होंगे या दुष्प्रभाव? इन्हीं सब आशंकाओं और संभावनाओं के बीच कई प्रतिभागी पक्ष में आए तो कई ने इसका विरोध करते हुए तर्क रखे। 

देश हित में एक देश एक चुनाव’ विषय पर दून विश्वविद्यालय में आयोजित प्रतियोगिता में 13 छात्र-छात्राओं ने प्रतिभाग किया। इनमें से पांच प्रतिभागी इसके समर्थन में दिखे, जबकि आठ ने विभिन्न तर्कों से इसका विरोध किया।
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पक्ष में बोलने वालों ने एकसाथ चुनाव का सबसे बड़ा लाभ पैसे की बचत को बताया। इसके लिए उन्होंने देश की आजादी के बाद से पहले चुनाव में आए खर्च की 17वें लोकसभा चुनाव के खर्च से तुलना की। कहा कि यह चुनाव अब तक का सबसे महंगा हुआ। इसमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से करीब 60 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए।

इस लोकसभा चुनाव के साथ कुछ विधानसभाओं के चुनाव भी कराए गए, जिसके परिणाम राज्यों की जनता के अनुकूल रहे और वहां बहुमत से सरकारें आईं। ऐसे में क्षेत्रीय मुद्दों व पार्टियों के गौण होने की संभावनाओं को पक्ष में बोलने वालों ने सिरे से खारिज किया।

बार-बार चुनाव ड्यूटियों में शिक्षकों की तैनाती से पढ़ाई पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। एक प्रतिभागी ने रिपोर्ट विशेष पर तर्क दिया कि बहुल चुनाव प्रणाली शिक्षक चुनाव के कामों में व्यस्त रहते हैं जबकि, अपना मूल काम शिक्षण महज 19.1 फीसदी कर पाते हैं।

बदलाव से देश के संघीय ढांचे पर पड़ेगा असर

वहीं, विपक्ष में बोलने वाले प्रतिभागियों ने इन तर्कों का खंडन किया। कहा कि चुनाव प्रणाली में इस बदलाव से देश के संघीय ढांचे पर असर पड़ेगा। उदाहरण देते हुए बताया कि यदि लोकसभा-विधानसभा चुनाव एक साथ होते हैं और अल्पमत से किसी एक राज्य या लोकसभा में सरकार गिरती है तब ऐसी स्थिति में क्या होगा? क्या विधानसभा भंग होगी या देश में आपातकाल लगेगा? ऐसी स्थिति में फिर चुनाव नहीं होंगे? होंगे तो क्या फिर से बहुल चुनाव प्रणाली विकसित नहीं होगी? इन्हीं सब प्रश्नों को उठाते हुए उन्होंने इस प्रणाली को हास्यास्पद बताया। प्रतिभागियों ने कहा आजादी के बाद यह प्रक्रिया शुरू हुई थी, लेकिन कुछ ही सालों में दम तोड़ गई।

जहां तक खर्च की बात है तो इतनी बड़ी व्यवस्था के लिए ईवीएम व वीवीपैट आदि पर जो खर्च होगा वह भी बड़ी मात्रा में होगा। ऐसे में खर्च कम होने की बात बेमानी है। विपक्षी प्रतिभागियों ने इस प्रणाली के लिए संविधान में कई बदलावों की जरूरत पर बल दिया। साथ ही इन बदलावों को संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ कहा। अंत में कहा कि यदि यह प्रणाली लागू करना जरूरी है तो देश के आर्थिक और सामाजिक हालात फिलहाल इसका समर्थन नहीं करते।

दूसरे देशों में भी यह प्रणाली विफल हुई है। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राज्य के पूर्व चुनाव आयुक्त वीसी चंदोला और विशिष्ट अतिथि के रूप में दून विवि के वीसी सीएस नौटियाल उपस्थित रहे। जबकि, एमकेपी की पूर्व प्रोफेसर जैनब ए रहमान, इंस्टीट्यूट ऑफ को-ऑपरेटिव मैनेजमेंट के प्रो. जीएस चौहान ने निर्णायक की भूमिका निभाई। 
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इन्हें मिला पुरस्कार

साक्षी बडोनी (एसजीआरआर पीजी कॉलेज)- प्रथम पुरस्कार, 7000 रुपये
धीरज कौशल (स्वामी रामतीर्थ कैंपस बादशाहीथौल टिहरी गढ़वाल)- द्वितीय पुरस्कार, 5000 रुपये 
राहुल कुमार (अनसुईया प्रसाद बहुगुणा पीजी कॉलेज अगस्त्यमुनी )- तृतीय पुरस्कार , 3000 रुपये
अनन्या भट्ट (लॉ कॉलेज, देहरादून)- सांत्वना पुरस्कार, 1500 रुपये 
राजेंद्र कुमार (अनसुईया प्रसाद बहुगुणा पीजी कॉलेज अगस्त्यमुनी )- सांत्वना पुरस्कार, 1500 रुपये 

70 साल पहले से तुलना नहीं कर सकते: चंदोला
प्रतियोगिता के अंत में मुख्य अतिथि राज्य के पूर्व चुनाव आयुक्त वीसी चंदोला ने भी विचार रखे। उन्होंने इस प्रणाली के विरोध और समर्थन को बहुत संतुलित तरीके से व्यक्त किया। एकल चुनाव प्रणाली में खर्च की 70 साल पहले के चुनावों से तुलना को उन्होंने खारिज किया। कहा 70 साल पहले एक डॉलर एक रुपये के बराबर था, लेकिन अब स्थिति अलग है। उन्होंने कहा कि जिन देशों से तुलना की जा रही है उनमें से ज्यादातर देश हमारे उत्तर प्रदेश से भी छोटे हैं। लिहाजा, प्रणाली को लागू करने से पहले मंथन की आवश्यकता है।
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