वहीं, विपक्ष में बोलने वाले प्रतिभागियों ने इन तर्कों का खंडन किया। कहा कि चुनाव प्रणाली में इस बदलाव से देश के संघीय ढांचे पर असर पड़ेगा। उदाहरण देते हुए बताया कि यदि लोकसभा-विधानसभा चुनाव एक साथ होते हैं और अल्पमत से किसी एक राज्य या लोकसभा में सरकार गिरती है तब ऐसी स्थिति में क्या होगा? क्या विधानसभा भंग होगी या देश में आपातकाल लगेगा? ऐसी स्थिति में फिर चुनाव नहीं होंगे? होंगे तो क्या फिर से बहुल चुनाव प्रणाली विकसित नहीं होगी? इन्हीं सब प्रश्नों को उठाते हुए उन्होंने इस प्रणाली को हास्यास्पद बताया। प्रतिभागियों ने कहा आजादी के बाद यह प्रक्रिया शुरू हुई थी, लेकिन कुछ ही सालों में दम तोड़ गई।
जहां तक खर्च की बात है तो इतनी बड़ी व्यवस्था के लिए ईवीएम व वीवीपैट आदि पर जो खर्च होगा वह भी बड़ी मात्रा में होगा। ऐसे में खर्च कम होने की बात बेमानी है। विपक्षी प्रतिभागियों ने इस प्रणाली के लिए संविधान में कई बदलावों की जरूरत पर बल दिया। साथ ही इन बदलावों को संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ कहा। अंत में कहा कि यदि यह प्रणाली लागू करना जरूरी है तो देश के आर्थिक और सामाजिक हालात फिलहाल इसका समर्थन नहीं करते।
दूसरे देशों में भी यह प्रणाली विफल हुई है। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राज्य के पूर्व चुनाव आयुक्त वीसी चंदोला और विशिष्ट अतिथि के रूप में दून विवि के वीसी सीएस नौटियाल उपस्थित रहे। जबकि, एमकेपी की पूर्व प्रोफेसर जैनब ए रहमान, इंस्टीट्यूट ऑफ को-ऑपरेटिव मैनेजमेंट के प्रो. जीएस चौहान ने निर्णायक की भूमिका निभाई।
साक्षी बडोनी (एसजीआरआर पीजी कॉलेज)- प्रथम पुरस्कार, 7000 रुपये
धीरज कौशल (स्वामी रामतीर्थ कैंपस बादशाहीथौल टिहरी गढ़वाल)- द्वितीय पुरस्कार, 5000 रुपये
राहुल कुमार (अनसुईया प्रसाद बहुगुणा पीजी कॉलेज अगस्त्यमुनी )- तृतीय पुरस्कार , 3000 रुपये
अनन्या भट्ट (लॉ कॉलेज, देहरादून)- सांत्वना पुरस्कार, 1500 रुपये
राजेंद्र कुमार (अनसुईया प्रसाद बहुगुणा पीजी कॉलेज अगस्त्यमुनी )- सांत्वना पुरस्कार, 1500 रुपये
70 साल पहले से तुलना नहीं कर सकते: चंदोला
प्रतियोगिता के अंत में मुख्य अतिथि राज्य के पूर्व चुनाव आयुक्त वीसी चंदोला ने भी विचार रखे। उन्होंने इस प्रणाली के विरोध और समर्थन को बहुत संतुलित तरीके से व्यक्त किया। एकल चुनाव प्रणाली में खर्च की 70 साल पहले के चुनावों से तुलना को उन्होंने खारिज किया। कहा 70 साल पहले एक डॉलर एक रुपये के बराबर था, लेकिन अब स्थिति अलग है। उन्होंने कहा कि जिन देशों से तुलना की जा रही है उनमें से ज्यादातर देश हमारे उत्तर प्रदेश से भी छोटे हैं। लिहाजा, प्रणाली को लागू करने से पहले मंथन की आवश्यकता है।