दशकों से महिला अपराध एक बड़ा मुद्दा रहा है। तमाम तरह से महिलाओं को शिकार बनाया जाता रहा है। अब तकनीक के दौर में भी महिलाओं की यही स्थिति है। साइबर अपराध का केंद्र भी महिलाएं ही बनती जा रही हैं। डीआईजी एसटीएफ (साइबर अपराध) रिदिम अग्रवाल ने बताया कि साइबर अपराध के लगभग 60-70 फीसदी मामलों में महिलाएं शिकार बन रही हैं। फिर चाहे पोर्नोग्राफी हो या फिर आर्थिक धोखाधड़ी। ऐसे में महिलाओं को अब साइबर अपराध के बारे में जागरूक करने की ज्यादा जरूरत है।
महिला अपराध की जड़ तक नहीं पहुंचे हम
महिला अपराध रोकने और दोषियों को सजा दिलाने के लिए कई कानूनों में बदलाव किए गए हैं। बच्चियों और महिलाओं से होने वाले दुष्कर्म के मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट तक बना दी। निसंदेह उन्हें न्याय मिल रहा है। मगर, आजादी के इतने लंबे समय बाद भी हम इस अपराध की जड़ तक नहीं पहुंच पाए हैं। वक्ताओं ने कहा कि हमने कागजों, विभिन्न मंचों पर चर्चा जरूर की हैं, लेकिन ऐसा कोई सिस्टम विकसित नहीं किया है जिससे इसकी जड़ पर वार किया जा सके।
कानून है तो उसका दुरुपयोग भी होता है। लेकिन, इसे रोकना पुलिस के हाथ में होता है। क्योंकि, कानून के क्षेत्र में पुलिस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। किसी भी अपराध में सिर्फ पुलिस उसे नजदीक से देखती है, जिसके बाद सुबूतों और गवाहों का दौर चलता है। ऐसे में यदि अपराधी छूट जाते हैं तो इसमें चूक भी पुलिस की मानी जाती है।
संवाद कार्यक्रम में चर्चा इस बात पर भी हुई कि महिला अपराध के मामलों में महिलाएं केवल हथियार के रूप में इस्तेमाल होती हैं। इसके लिए दहेज का कानून विवादों में रहा है। अब दुष्कर्म और छेड़छाड़ जैसे मामलों में ऐसा कुछ देखने को मिलता है। कुछ दिन पहले सिल्वर स्क्रीन पर फिल्म सेक्शन 375 में भी कुछ यही दिखाने का प्रयास किया था। वक्ताओं ने कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस पर भी सवाल उठते हैं।
डीआईजी रिदिम अग्रवाल ने बताया ऐसे मामलों में पुलिस की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। अपराध की सूचना से अदालत में फैसले तक हर चीज पुलिस के सामने होती है। सही मायनों में पुलिस को प्राथमिक जांच के बाद पता चल जाता है कि वास्तव में गुनहगार कौन है? लिहाजा, पुलिस पहले से इस बात का फैसला अपने मन में बनाकर चलती है कि किसे सजा होनी चाहिए और कहां कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है। इन्हीं मामलों को देखते हुए अब एफआईआर के नियम भी बदल दिए हैं। कई अपराधों की सूचना में एफआईआर से पहले जांच जरूरी होती है।
महिला अपराधों के मामलों में कई बार यह देखने में आता है कि मुकदमा विशेष किसी को फंसाने या रंजिशन दर्ज कराया गया था। इनमें भी ज्यादातर महिलाओं या बच्चियों को यह पता नहीं होता कि उन्हें हथियार बनाया जा रहा है। ताकि, कोई खुन्नस निकाल सके। ऐसे में अब यह जागरूकता के माध्यम से दूर किया जा सकता है। यदि इनमें जागरूकता आएगी तो वे इस तरह हथियार बनने से बच सकती हैं।
ये रहे उपस्थित
डीआईजी एसटीएफ रिदिम अग्रवाल, आईपीएस भदाणे विशाखा अशोक, पार्षद अमिता सिंह, कोमल वोहरा, समिधा गुरुंग, संगीता गुप्ता, एसआई प्रमिला बिष्ट, आशा पंचम, सरिता बिष्ट, अनिता बिष्ट, नीमा रावत, सिपाही सुहाती, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मीनाक्षी रावत, मंजू मौर्या, रेखा नेगी, सुमति थपलियाल, रानी श्रीवास्तव, शिक्षक आशा नेगी, गोदावरी शर्मा, पार्षद मीना बिष्ट, पार्षद उर्मिला, डॉ. हर्षिता, आयुषी बिष्ट, अर्चना शर्मा, चिराग धवन, भवदीप।