उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सहकारिता के जरिये गांवों के बंजर खेतों को आबाद करने की योजना में सहकारी संस्थाएं पूरी तरह से किनारे हो गई हैं।
संस्थाएं अपने स्तर से पैसा लगाने के लिए भी तैयार थीं। लेकिन, सरकार की ओर से ही इसमें कोई जवाब नहीं मिला। अब वन विलेज, वन फार्म योजना में सरकार एग्री बिजनेस को एक मॉडल के रूप में सामने लाने की तैयारी में है। इस मॉडल में जमीन को आधार बनाकर गांव के लोगों की ही कंपनी खड़ी की जाएगी। हालांकि इसमें सबसे बड़ी समस्या भूमि प्रबंधन की ही सामने आएगी।
सहकारी संस्थाओं की योजना प्रारंभिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स) के जरिये गांवों में खेती कराने की थी। इस योजना के तहत सहकारी संस्थाएं गांवों में सामूहिक रूप से खेती कराने के लिए गांव वालों की सहकारी संस्था बनाने के पक्ष में थीं। इनका कहना था कि सहकारी संस्था गांवों में सामूहिक रूप से खेती कराती और इसके लिए कृषि उपकरण, खाद, बीज आदि उपलब्ध कराती। लेकिन, अब इन्होंने इस योजना से किनारा कर लिया है।
राज्य सहकारी संघ के अध्यक्ष प्रमोद कुमार सिंह का कहना है कि इस योजना को मुख्यमंत्री के सामने रखा गया था। सहकारी संस्थाओं को इस योजना पर सरकार से अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। सूत्रों के मुताबिक ,ज्यादा आसार इस बात के हैं कि सहकारी संस्थाएं इस योजना से खुद को अलग ही कर लें।
दूसरी ओर, सरकार अब जिस योजना पर काम कर रही है, उसमें तस्वीर बिल्कुल दूसरी है। मुख्यमंत्री हरीश रावत जिस योजना का संकेत दे रहे हैं, उसमें गांव वालों की कंपनी होगी, जो उत्पादन के साथ-साथ मार्केटिंग का काम भी करेगी। कंपनी में गांव वालों की प्रति नाली जमीन के हिसाब से शेयर होगा।
इस मॉडल में सबसे अधिक परेशानी भू प्रबंधन की ही होगी। सरकार के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह होगी कि यह स्पष्ट हो कि किसके पास कहां कितनी जमीन है। पर्वतीय क्षेत्रों में लंबे समय से भू बंदोबस्त नहीं हुआ है। चकबंदी भी पहाड़ों में अभी शुरू नहीं हो पाई है। जानकारों के मुताबिक, योजना कुछ-कुछ एग्री बिजनेस के रूप में है। इसके लिए हर कंपनी को प्रोफेशनल की जरूरत होगी।