प्रदेश में परिवार नियोजन की मुहिम फ्लाप हो रही है। वर्ष 2015-16 में नसबंदी कराने वाली 176 महिलाओं के आपरेशन फेल हो गए और उनकी गोद भर गई। इसके साथ ही नसबंदी केस का आंकड़ा लगातार नीचे आ रहा है।
केंद्र सरकार के उपायुक्त (परिवार नियोजन) डा. एसके सिकंदर ने बताया कि पांच साल पहले जहां पुरुषों की नसबंदी के केस दो हजार थे, वहीं अब यह आंकड़ा पांच सौ पर आ गया है। प्रदेश से इस संबंध में गंभीरता बरतने और कार्य की गुणवत्ता सुधारने के लिए कहा जा रहा है।
सोमवार को परिवार नियोजन की प्रदेश स्तरीय वार्षिक समीक्षा के लिए सुभाष रोड स्थित एक होटल में कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में सभी जिलों के मुख्य चिकित्साधिकारियों ने शिरकत की। बताया गया कि परिवार नियोजन अभियान में सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन का सख्ती से पालन किया जाना है।
गुणवत्ता बनाए रखने के लिए एक दिन में 30 से अधिक परिवार नियोजन के केस न किए जाएं। जिन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आपरेशन थिएटर हैं, नसबंदी के आपरेशन वहीं किए जाएं। तंबू लगाकर नसबंदी करना प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस मौके पर वर्ष 2015-16 में 176 और वर्ष 2013-14 में 29 केस फेल होने पर चिंता जाहिर की गई।
यह कहा गया कि नसबंदी फेल होने की पुष्टि पर 90 दिन के अंदर रिपोर्ट दी जाए। इसके साथ ही आपरेशन के बाद जटिलताओं की भी रिपोर्टिंग की जाए। नसबंदी फेल होने वाले प्रत्येक केस पर 30 हजार रुपये दिए जाएंगे। गर्भवती की मौत पर चार लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। कार्यक्रम की अध्यक्ष निदेशक राष्ट्रीय कार्यक्रम डा. आरएस असवाल ने की। इस मौके पर डा. प्रगति सिंह, डा. निधि भट्ट आदि ने विचार व्यक्त किए।