20 साल पहले जिस शोध की लोकसभा में सराहना हुई थी और जिसके लिए वैद्य बालेंदु प्रकाश को पद्मश्री मिला, वह इस पूरी अवधि में एक कदम आगे नहीं बढ़ पाया। अब 20 साल बाद एक बार फिर लोक सभा में इस शोध की गूंज सुनाई दी। साथ ही इसके आगे बढ़ने की उम्मीद भी बंधने लगी है।
उत्तराखंड के वैद्य बालेंदु ने 1997 में एक्यूट प्रोमाइलोसिटिक ल्यूकेमिया (एक तरह का ब्लड कैंसर) के उपचार की आयुर्वेदिक दवा पर शोध किया था। यह एक बेहद गंभीर बीमारी है, जिसमें प्लेटलेट्स की कमी और ब्लीडिंग के कारण ज्यादातर मरीजों की मौत हो जाती है। उनके पिता ने 1982 में उस दवा से एक बच्चे का उपचार किया था, जो अब भी जीवित है। वैद्य बालेंदु ने उसी दवा से कई मरीजों का उपचार किया। उनके अनुरोध पर सरकार ने उनके शोध प्रोजेक्ट को मंजूरी दी। जिसके तहत 3.30 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई और 15 मरीजों का उपचार करने को कहा गया। 90 दिन के उपचार के दौरान चार मरीजों की मौत हो गई, लेकिन जिन 11 मरीजों ने 90 दिन का उपचार करवाया, वह सभी जीवित रहे।
इस पर नेशनल रिसर्च डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने इसका यूएस और यूरोपियन पेटेंट प्राप्त किया। साथ ही केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान परिषद के साथ शोध को आगे बढ़ाने के लिए एमओयू हुआ, लेकिन पिछले 20 वर्षों के दौरान कुछ नहीं हुआ। कुछ दिन पूर्व खीरी के सांसद अजय मिश्रा ने यह मामला लोक सभा में उठाया था। उन्होंने दवा को मरीजों के लिए फायदेमंद बताते हुए इसके व्यावसायिक उपयोग को बढ़ावा देने और शोध के संबंध में जानकारी मांगी थी।
पिछले 20 वर्षों के दौरान इस शोध को लेकर कार्य किया जाता तो यह फायदेमंद होता। अब एक बार फिर लोकसभा में इसको उठाया गया है। उम्मीद है अगले कुछ दिनों में इस मामले में कार्रवाई होगी।
- पद्मश्री वैद्य बालेंदु प्रकाश
मैंने एक पुस्तक में इसके शोध के बारे में पढ़ा था। मुझे लगा कि यह मरीजों के लिए फायदेमंद है। नियम 377 के तहत मैंने लोकसभा में यह मामला उठाया था। आयुष मंत्रालय से जवाब आने के बाद ही मैं आगे कुछ कह पाऊंगा।
- अजय मिश्रा, सांसद, खीरी