कहा जा रहा है कि बच्चे जब भूखे पेट इसका सेवन करते हैं तो यह उनके शरीर में शुगर स्तर को घटा देता है, जिससे उन्हें गंभीर बीमारी हो जाती है। इस संबंध में मुजफ्फरपुर (बिहार) स्थित लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विशाल नाथ से अमर उजाला ने फोन पर बात की।
डॉ. नाथ ने बताया कि लीची के पल्प (गूदा) को कई बार जांच के लिए भेजा जा चुका है। पल्प में एमसीपीजी की मात्रा नहीं है। ऐसे में यह कहना कि लीची के सेवन से बच्चों में यह बीमारी हो रही है गलत है।
बिहार के क्षेत्र विशेष में भी यह महज एक संयोग है। उन्होंने बताया कि इस शोध को जल्द प्रकाशित भी किया जाएगा। इधर, संचारी रोग नियंत्रण के राज्य नोडल अधिकारी डॉ. पंकज सिंह ने बताया कि उन्होंने कई शोधों का अध्ययन किया है। कई जगह उनकी बातें भी हुई हैं, लेकिन अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि यह रोग लीची के सेवन से फैल रहा है।
डॉ. नाथ के अनुसार एमसीपीजी की मात्रा को लेकर दक्षिण अमेरिका में ‘एकी’ नाम के फल पर शोध हुआ था। यह फल लीची के परिवार (सापंडेसिया) का ही है, जिसकी बनावट भी लगभग लीची जैसी है।
इसके बीज में एमसीपीजी की मात्रा पाई गई थी। डॉ. नाथ ने बताया कि कच्ची लीची के बीज में भी इसकी मात्रा पाई जाती है, लेकिन पके हुए फल में नहीं। इसका बीज नहीं बल्कि पल्प खाया जाता है, इसीलिए ये सब बातें निराधार हैं।