उत्तराखंड सरकार की हरिद्वार और उधमसिंहनगर में खनन को पूरी तरह से बंद करने की मुहिम को झटका लग सकता है।
जिलों से शासन को भेजी गई रिपोर्ट में इसके खासे गंभीर परिणाम बताए गए हैं। उधमसिंह नगर में खनन सामग्री की कमी होने पर परियोजनाओं की लागत में करीब चार प्रतिशत के इजाफे का अनुमान है। पर आशंका यह है कि गढ़वाल मंडल के जिलों की कमर की टूट जाएगी।
यहां सड़क से लेकर अन्य परियोजनाओं की कीमत में करीब 15 प्रतिशत तक के इजाफे का अनुमान है। ऐसे में उधमसिंहनगर में योजनाओं पर अतिरिक्त दस करोड़ तो गढ़वाल में करीब 200 करोड़ रुपए की अतिरिक्त लागत का अनुमान है।
मातृ सदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद के अनशन के बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हरिद्वार, देहरादून और उधमसिंहनगर में खनन पूरी तरह से बंद करने का आदेश दिया था। मुख्यमंत्री ने शासन को इसके प्रभाव का आकलन करने का भी निर्देश दिया था और साथ ही विकल्प भी मांगा था।
प्रभाव के आंकलन पर जिलाधिकारियों की जो रिपोर्ट सामने आई है वह आर्थिक रूप से बेहद नुकसान पहुंचने की है। हरिद्वार जिला प्रशासन की रिपोर्ट के मुताबिक हरिद्वार की नदियों से प्रतिदिन 50 हजार टन आबीएम(रिवर बैड मटिरियल), रेता और बजरी की निकासी होती है। हरिद्वार में 40 स्टोन क्रेशर हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक हरिद्वार में हाइवे को चार लेन करने सहित अर्द्धकुंभ के तहत निर्माण कार्य जारी हैं। हरिद्वार से ही पूरे गढ़वाल मंडल को इस सामग्री को भेजा जाता है। कहा गया है कि गढ़वाल मंडल के जिलों में परियोजनाओं की लागत में करीब 15 प्रतिशत तक का इजाफा हो जाएगा और करीब 200 करोड़ रुपए की अतिरिक्त लागत लगेगी।
देहरादून में मात्र 4800 टन खनन सामग्री का ही उत्पादन होता है। उधमसिंहनगर की एक दर्जन नदियों में से कोसी में खनन हो रहा है। खनन बंद होने से यहां योजनाओं की लागत में चार प्रतिशत का इजाफा संभव है। रिपोर्ट के मुताबिक यहां स्टोन क्रेशर से लेकर खनन सामग्री से संबंधित कई उद्योग धंधे फल फूल रहे हैं। खनन बंद होने से इन सब पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
जिलाधिकारियों के मुताबिक खनन बंद होने से खनन सामग्री भी महंगी हो जाएगी। पौंटा और अन्य स्थान सौ कि लोमीटर से अधिक की दूरी पर हैं। ऐसे में यह सारी सामग्री बाहर से आएगी। इन स्थानों की अपनी मांग भी है। लिहाजा न सिर्फ बिल्डिंग मटीरियल महंगा होगा बल्कि इसकी कमी भी हो जाएगी।