अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 360 सीट जीतने का संकल्प जाहिर किया था। हर छोटे-बडे़ चुनाव में विजय रथ को निर्बाध गति से दौड़ाए रखने की बात पहले से होती रही है। प्रचंड जीत का खुशनुमा माहौल बीजेपी किसी कीमत पर खोना नहीं चाहती है।
मगर राजधानी के एमकेपी कॉलेज के छात्र संघ चुनाव में जिस तरह से एबीवीपी का सूपड़ा साफ हुआ है, उसने बीजेपी को सकते में डाल दिया है। मामला सिर्फ एक कॉलेज में किसी संगठन की हार या जीत से जुड़ा नहीं है। इसका विस्तार कहीं आगे तक है। बात निकाय, पंचायत, कैंट चुनाव से होते हुए लोकसभा चुनाव तक पहुंचनी है। इन स्थितियों के बीच, विधानसभा चुनाव में प्रचंड हार के बाद कांग्रेस को उसके छात्र संगठन एनएसयूआई ने मुस्कराने और उम्मीदों से भर जाने का मौका तो दे ही दिया है।
बीजेपी सरकार और संगठन दोनों के लिए विचार करने योग्य कई सारी बातें सामने हैं। सवाल भी कई हैं। क्या पांच महीने पुरानी सरकार के कामकाज छात्रों को पसंद नहीं आ रहे हैं ? क्या कॉलेजों में भगवा और सुधार के एजेंडे को लागू करने की कसरत के खिलाफ माहौल है, या फिर बीजेपी और उनके सहयोगी संगठनों के सपने बडे़ हैं और उस हिसाब से तैयारी छोटी है ?
अटकी सांसों के बीच दम भरने की चुनौती
ABVP
- फोटो : Amar Ujala
अनुशासन के लिहाज से खास पहचान वाले लड़कियों के एमकेपी कॉलेज में एबीवीपी की हार के खास मायने हैं। विभिन्न कॉलेजों में छात्र संघ चुनाव हालांकि अभी सितंबर तक होने हैं, लेकिन एबीवीपी की यह खराब शुरुआत बीजेपी की सांसों को अटकाने और दम को फुलाने वाली है। चुनौती अभी आगे की भी है, जबकि उन सभी कॉलेजों में एबीवीपी का प्रदर्शन कसौटी पर होगा, जहां पर पिछले सत्र में उसने बेहतरीन प्रदर्शन किया था।
पिछले सत्र के छात्र संघ चुनाव में बीजेपी के सहयोगी संगठन एबीवीपी ने कॉलेजों के भीतर एनएसयूआई से लंबी बढ़त हासिल की थी। हर प्रमुख कॉलेज में एबीवीपी का पैनल जीतकर आया था। एबीवीपी के नेताओं के अनुसार, 80 फीसदी सीटों पर उनकी जीत हुई थी। हालांकि एनएसयूआई के नेता इसे खारिज करते आए हैं। मगर इतना जरूर स्वीकार करते हैं कि पिछली बार उनका संगठन सिर्फ 45 प्रतिशत सीटों पर ही जीत पाया था।
बीजेपी ने पिछली बार के चुनाव के नतीजों को परिवर्तन की सुगबुगाहट से जोड़कर पेश किया था, मगर अब पार्टी संगठन से बेहद सामान्य बताने की कोशिश में है। इन स्थितियों के बीच, बीजेपी और उनके सहयोगी संगठनों के सामने पूरी ताकत से दून के डीएवी, डीबीएस के अलावा, ऋषिकेश, नैनीताल, अल्मोड़ा, हल्द्वानी, श्रीनगर और गोपेश्वर जैसे कॉलेजों में जुटने की चुनौती है, जहां पर उसका पिछला प्रदर्शन बेहद प्रभावी रहा है।
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट का कहना है कि यह सामान्य बात है और इसे बीजेपी की सरकार और संगठन के प्रदर्शन से जोड़ना उचित नहीं होगा। एकाध कॉलेजों में स्थानीय कारणों से नतीजों पर फर्क पड़ सकता है। मगर इससे कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए। एबीवीपी राष्ट्रवादी विचारधारा वाला हमारा सहयोगी संगठन है, जिसका कॉलेजों में आधार लगातार बढ़ रहा है। हम मिशन-2019 के लिए मजबूती से कदम उठा रहे हैं।
उत्तराखंड सरकार में प्रवक्ता मदन कौशिक ने बताया कि एबीवीपी की हार और एनएसयूआई की जीत का राज्य सरकार के कामकाज से कोई तालमेल नहीं है। सरकार कॉलेजों का माहौल सुधारने के लिए बेहतर ढंग से काम कर रही है। चुनाव एक अलग विषय होता है और प्रबंधन और रणनीति का इसमें खास योगदान होता है। इसके अलावा, विभिन्न कॉलेजों में छात्र संघ चुनाव होने अभी शेष है। हमें उम्मीद है कि एबीवीपी अन्य जगहों पर अच्छा प्रदर्शन करेगी।