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पलायन से मंडराया संस्कृति पर संकट

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हरिद्वार। पहाड़ के गांवों से लगातार हो रहे पलायन से यहां की संस्कृति पर भी संकट मंडराने लगा है। पहाड़ की संस्कृति के अभिन्न अंग ढोल और दमाऊं भी विलुप्ति के कगार पर है। संस्कृति के संरक्षक ढोल वादकों को भी इस का दर्द सला रहा है। ढोल वादकों का कहना है कि इस कला से अब पेट भरना मुश्किल है। इसलिए नई पीढ़ी इस काम को नहीं करना चाहती। ये लोग चाहते हैं कि कला को संरक्षित कर रोजगार से जोड़ने का काम किया जाए।
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जाने-माने जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण ने कहा कि पलायन और पाश्चात्य संस्कृति ने हमारी संस्कृति को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि हमारी नई पीढ़ी इस संस्कृति को आगे नहीं बढ़ा पाई। उन्होंने सरकार से मांग की कि इस तरह की कार्यशाला का आयोजन प्रतिमाह कराना चाहिए, ताकि हमारी संस्कृति पूरे विश्व में छाप छोड़ सके।
उत्तरकाशी से आए ढोल दमाऊं सिखाने वाले गुरु कबीर दास की मानें तो गांव में ऐसे कलाकारों की संख्या कम होती जा रही है। उन्होंने बताया कि झुमराड़ा नौगांव में 140 परिवार रहते हैं ये सभी ढोल दमाऊं बजाते थे, लेकिन वर्तमान में मात्र 60 ही परिवार इससे जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि रोजगार से जोड़े जाने पर ही संस्कृति को बचाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि ढोल दमाऊं बजाने वाले कलाकार अपने घरों का खर्च तक नहीं उठा पा रहे हैं। जिस कारण उनको अन्य काम भी करना पड़ता है। 50 साल से ढोल दमाऊं के माध्यम से देवी देवताओं को नचाने वाले नौगांव कुडाव उत्तरकाशी के बच्चन दास के मुताबिक अब उनके बच्चे इस संस्कृति को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। उन्होंने बताया कि उनके गांव में 12 परिवार ढ़ोल बजाते आ रहे थे, लेकिन अब मात्र उनका परिवार ही इससे जुड़ा हुआ है।
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