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कार्यशैली में बदलाव लाए यूपीसीएल प्रबंधन

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कार्यशैली में बदलाव लाए यूपीसीएल प्रबंधन
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विद्युत नियामक आयोग ने बिजली दरें बढ़ाने के बजाए लाइन लॉस कम करने को कहा, रिव्यू पिटीशन पर फैसला सुरक्षित
-- बिजली दरों में 7.31 फीसदी में बढ़ोत्तरी को लेकर यूपीसीएल को लगा करारा झटका
अमर उजाला ब्यूरो
देहरादून। विद्युत नियामक आयोग मेें बिजली दरों मेें बढ़ोत्तरी को लेकर दाखिल रिव्यू पिटीशन में सुनवाई के दौरान आयोग अध्यक्ष सुभाष कुमार ने यूपीसीएल प्रबंधन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि यूपीसीएल प्रबंधन बिजली दरें बढ़ाकर उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालने के बजाए लाइन लॉस कम करके खर्च को कम करे। आयोग ने यूपीसीएल की राजस्व वसूली को लेकर भी अफसराें को कटघरे में खड़ा कर दिया। नियामक आयोग ने यूपीसीएल की याचिका पर सुनवाई तो की लेकिन फिलहाल फैसला सुरक्षित रख लिया है।
उल्लेखनीय है कि यूपीसीएल ने विद्युत नियामक आयोग में रिव्यू पिटीशन दाखिल कर बिजली दराें में 7.31 फीसदी अतिरिक्त बढ़ोत्तरी की मांग की है। नियामक आयोग में मंगलवार को रिव्यू पिटीशन की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान जहां यूपीसीएल अफसरों ने भारी लाइन लॉस का हवाला देते हुए बिजली दरों मेें बढ़ोत्तरी की मांग करते हुए 440 करोड़ की भरपाई की मांग की, वही उपभोक्ताओं ने यूपीसीएल की इस मांग का पुरजोर विरोध किया। उपभोक्ताओं ने कहा कि यूपीसीएल 16.68 फीसदी बिजली लाइन लॉस का हवाला देते हुए बिजली दरों में बढ़ोत्तरी की मांग कर रहा हैं वही राज्य के उद्योगों का लाइन लॉस महज दो फीसदी है। इतना ही नहीं सुनवाई के दौरान आयोग ने भी कहा कि उसकी ओर से वित्तीय वर्ष 2016-17 में 15 फीसदी लाइन लास, वित्तीय वर्ष 2017-18 में 14.75 फीसदी, और साल 2018-19 में 14.50 फीसदी लाइन लास की दरें तय की है। जबकि यूपीसीएल का दावा है कि 17 फीसदी के आसपास है।
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यूपीसीएल अफसरों ने यह तर्क देकर बचाव की कोशिश की कि केंद्र सरकार समेत तमाम एजेंसियों से बिजली खरीदते समय उन्हें तत्काल भुगतान करना होता है। साथ ही लोन की रकम समय पर नही जमा कराने की वजह से ब्याज भी देना पड़ता है। इस पर उपभोक्ताओं ने कहा कि यूपीसीएल उपभोक्ताओं से समय पर राजस्व वसूली न कर पाए तो यह उसकी गलती है। दूसरी ओर आयोग के सचिव नीरज सती ने बताया कि दोनों पक्षों को सुना गया है। जहां बिजली दरों में बढृोत्तरी का सवाल है तो इस संबंध में फैसला सुरक्षित रख लिया गया है।
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