अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
मई जून के महीने में विवादित संतों के बारे में कोई फैसला नहीं हो पाया। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती सहित पांच शंकराचार्य हरिद्वार में मौजूद रहे। अखाड़ा परिषद ने भी संतों का राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया। इसके बावजूद कोई विवाद नहीं सुलझा और शंकराचार्य पदों का विवाद और बढ़ गया।
स्वामी अच्युतानंद तीर्थ के बहाने अखाड़ा परिषद पिछले कई महीनों से राजनीति कर रही है। परिषद कई वर्षों से घोषणा करती आई है कि फर्जी संतों को बाहर किया जाएगा। इस संबंध में जब पुरी और श्रृंगेरी के शंकराचार्यों को भी आने का निमंत्रण दिया गया तो उन्होंने इस विवाद में भाग लेने से इनकार कर दिया। बुरी तरह खफा अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत नरेंद्र गिरी हरिद्वार आए, लेकिन तमाशा यह हुआ कि जिस वासुदेवानंद को उन्होंने फर्जी बताया, उनके साथ विहिप के मंच पर जा बैठे। जबकि एक दिन पहले ही अखाड़ा परिषद और तमाम षड़दर्शन संतों ने वासुदेवानंद और अच्युतानंद तीर्थ को फर्जी शंकराचार्य करार दिया था।
संत सम्मेलन में एकमत से शारदा और ज्योर्ति पीठ पर स्वरूपानंद सरस्वती का अधिकार जताया था। इसके बावजूद वासुदेवानंद न केवल जोशीमठ के ज्योर्तिमठ में अभी तक आसीन हैं, जबकि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती वहां से लौटकर हरिद्वार से भी चले गए हैं। स्वरूपानंद के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने जब वासुदेवानंद के अधिकार वाले पूर्णागिरी के मंदिर में प्रवेश करना चाहा तो उन्हें बाहर खदेड़ दिया गया। कई दिनों का अनशन करने के बावजूद उत्तराखंड सरकार ने उनका कोई साथ नहीं दिया और अब वे बनारस वापस लौट रहे हैं।
हरिद्वार में शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती की उपस्थित में उनके प्रतिद्वंदी अच्युतानंद तीर्थ ने एक भव्य सम्मेलन का आयोजन भूमा निकेतन में किया। उन्होंने स्वरूपानंद सरस्वती के घोर विरोधी सुमेरु पीठाधीश्वर शंकराचार्य नरेंद्रानंद गिरी और वासुदेवानंद सरस्वती को कार्यक्रम में आमंत्रित किया। ये तीनों स्वरूपानंद सरस्वती के खिलाफ फैसले लेते रहे और कोई कुछ नहीं कर पाया। अखाड़ा परिषद बार बार यह कहती रही है कि वह आसाराम बापू, रामपाल और नित्यानंद स्वामी जैसे फर्जी संतों को अखाड़ा परिषद से बहिष्कृत करना चाहती है। इसके बावजूद हरिद्वार के सम्मेलन में कोई भी फैसला नहीं हुआ।